सोमवार, 28 जुलाई 2014

वैवाहिक बुढ़िया पुराण

विवाह एक महत्वपूर्ण सामाजिक संस्था है जिसका उद्देश्य व्यक्ति को जैविक और सामाजिक पूर्णता प्रदान कर समाज की निरंतरता बनाये रखने के मान्यविधान को गतिशील रखना है |विभिन्न भाषाओं  ,संस्कृति और जातीय वैशिष्ट्य के आधार पर विवाह के अनेक स्वरूप और रीतियाँ प्रचलित हैं लेकिन इन सभी का यहाँ विवेचन करना हमारा अभीष्ट न होकर हिंदी भाषी क्षेत्र के हिन्दुओं में विवाह के समय होने वाले लोकाचारों की प्रासंगिकता को रेखांकित कर उनके औचित्य को परखना और विमर्श करना है |
                  विवाह के अनुष्ठान का वर और कन्या की कुंडली मिलान के साथ श्रीगणेश होता है |भावी दम्पति का जीवन सुखमय और निर्विघ्न हो इसलिए ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुरूप वर और कन्या की कुंडली मिलाई जाती  है |लेकिन अनेक बार वर और कन्या में ज्योतिषीय अनुरूपताओं के बावजूद उनका वैवाहिक जीवन असंतोषपूर्ण और असफल होता है अथवा निर्दोष विवाह मुहूर्त होने पर भी प्राकृतिक या मानवीय बाधाएँ उपस्थित हो जाती  हैं |इसके विपरीत ऐसे अनेक उदाहरण  हैं जिनमें विना कुंडली मिलाये या विना शुभ मुहूर्त के संपन्न हुए विवाह पूर्ण सफल रहे हैं और उनके बीच तालमेल की कोई कठिनाई नहीं आई |बहरहाल  सुखी और सफल दाम्पत्य जीवन के लिए ज्योतिषीय अनुरुपताओं की निर्णायकता और प्रभावकारिता वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित नहीं है |लेकिन यदि विवाह निश्चित करते समय विवाहर्थियों के स्वास्थ्य सम्बन्धी पहलुओं को दृष्टिगत रखा जाये तो यह भावी दम्पति के लिए अवश्य लाभप्रद होगा |
                  वर पक्ष और कन्या पक्ष दोनों के संतुष्ट और सहमत होने पर विवाह का पहला चरण पूरा होता है और दूसरे सोपान के रूप में लग्नोत्सव का कार्यक्रम होता है जिसमें कन्या पक्ष द्वारा लग्न पत्रिका वर पक्ष को प्रेषित की जाती है |इसमें वैवाहिक अनुष्ठान का पूरा समयबद्ध विवरण समाहित रहता है और जो इस अनुष्ठान के शुभारम्भ की औपचारिक घोषणा भी होती है |
                  पुराने समय में जब न मशीनी आटा चक्की थी और न गैस से संचालित होने वाले चूल्हे थे ,एक बड़े समूह के लिए भोजन का प्रबंध करना निश्चय ही एक कठिन और चुनौती भरा कार्य था |इसलिए सहकार के आधार पर इस चुनौती से निपटा जाता था |चूँकि खाना बनाने के वास्ते बड़े-बड़े चूल्हे बनाने के लिए काफी मात्रा में मिट्टी की आवश्यकता होती थी इसलिए विवाहार्थी पक्ष और उनकी सम्बन्धी व मित्र महिलाएं इस कार्य हेतु मिट्टी लाने के लिए गाँव के किसी उपयुक्त स्थान पर सामूहिक रूप से जाती थीं और गाते-बजाते हुए समारोहपूर्वक इस कार्य को संपन्न करती थीं ,जो 'मटियाने की रस्म' कहलाती है |इसी प्रकार आटा पीसने का कार्य भी सहकार के आधार पर होता था, जिसमें सभी सम्बन्धी और मित्र महिलाएं हाथ बाँटती और श्रम-परिहार के लिए मंगलगीत गाते हुए इस चुनौती भरे कार्य को पूरा करती थीं |चूँकि यह एक समयसाध्य कार्य था इसलिए विवाहार्थी पक्ष द्वारा आगंतुक महिलाओं के लिए स्वल्पाहार की व्यवस्था की जाती थी जो चबैना कहलाता था और जो सामान्यतः अंकुरित चना (बिल्हा) होता था |भले ही आज यह सारा कार्य बिजली से चलने वाले उपकरणों की मदद से सहजता से हो जाता है  लेकिन सहकार की वह दुर्लभ सामाजिक भावना लुप्त होती जा रही  है,जो हमारी सबसे बड़ी विशिष्टता रही है |आज इन रस्मों को उनके औचित्य और उपयोगिता को समझे विना  महज लकीर पीटने के लिए ही निभाया जाता है |
               हल्दी और मेहंदी की रस्मों का उद्देश्य  वर और कन्या के रूप-सौन्दर्य को निखारना और उनके व्यक्तित्व में चार चाँद लगाना है |ये महज रस्में नहीं हैं बल्कि इन्हें निभाते समय जो प्यार और अपनापन छलकता है ,वह अतुलनीय है |आज पेशेवर सौन्दर्य-विशेषज्ञ इस कार्य के लिए बुलाये जाते हैं लेकिन उसमें भावनाओं की वह अनूठी मिठास कहाँ होती है ?
             वर और कन्या दोनों पक्षों में मंडप-आच्छादन का कार्यक्रम होता है |मंडप वह निर्दिष्ट स्थान होता है जहाँ पर इस अनुष्ठान से जुड़ीं सभी प्रमुख रस्में पूरी की जाती हैं | इसका निर्माण में लकड़ी के चार खम्भों और आच्छादन के लिए कांस या घास-फूस का उपयोग होता है |वर पक्ष के यहाँ मंडप के मध्य में एक स्तम्भ पर दीपाधार लगा रहता है जिस पर दीपक प्रज्वलित कर रखा जाता है और जो घर में हर्षोल्लास के आगमन का प्रतीक होता है |कन्या पक्ष के यहाँ मंडप के चारों खम्भों के सहारे मिट्टी के सात-सात कलश रखे जाते हैं जो आम के पत्तों से सुसज्जित रहते हैं |जिन्हें चौरी कहते हैं ,स्थान भेद से इसके लिए अन्य नाम भी प्रचलित हो सकते हैं |मिट्टी के ये सुसज्जित कलश संपन्नता का प्रतीक होते हैं |सप्तपदी के समय जब वर-कन्या मंडप की प्रदक्षिणा करते हैं ,हल्दी में रंगा कच्चा सूत(कलावा)उसके चारों ओर लपेटा जाता है |जो कच्चे सूत की तरह नाजुक वैवाहिक रिश्ते को यत्नपूर्वक और सावधानी से सहेजने-सँभालने के गहरे अर्थ को अपने भीतर समेटे होता है |
विवाहार्थी पक्ष के सभी निकट सम्बन्धियों के कपड़ों पर हल्दी रँगे दोनों हाथों की छाप लगाई जाती है |यह  एक पहचान-चिन्ह है जो विवाहार्थी पक्ष से उनकी निकटता दर्शाता है |पाणिग्रहण के दिन एक महत्वपूर्ण रस्म वर-कन्या के मामा पक्ष द्वारा पूरी की जाती है जो भात,चीकट या पहरावनी के नाम से जानी जाती है ,जिसमें भाई(भतैया)अपनी बहिन (यथास्थिति ,वर या कन्या की माँ )को भात(चावल)भेंट करता है ,जिसे खाकर वह अपना उपवास तोड़ती है |इस अवसर पर भतैया अपनी बहिन,बहनोई और उनके परिजनों को यथाशक्ति वस्त्र-आभूषण भेंट करता है जो इस पावन कार्य के संपादन में उनके सहयोग का विवक्षित आश्वासन होता है |
                 पाणिग्रहण के समय वर पक्ष  कन्या(दुल्हन)के श्रृंगार के निमित्त जो सौभाग्य -सामग्री ले जाता है उसमें लकड़ी का बना सिंदूरदान(सिंदरोटा)प्रमुख होता है |यह सिंदरोटा ही अब सिन्दोरी-सिंदोरा कहलाने लगा है |इसी अवसर पर जल के देवता वरुण की पूजा के लिए मिट्टी के एक सुसज्जित कलश(बरौना) में सात प्रकार की सामग्री रखकर वर पक्ष ले जाता है जो बाद में नदी या तालाब में विसर्जित कर दी जाती है |बरौना की यह रस्म वैदिक देवता वरुण को  प्राचीन काल में मिलने वाले महत्व को प्रमुखता से दर्शाती है |
                  विवाह से जुड़ी एक दिलचस्प रस्म धान-बुबाई की रस्म है |जिसमें मंडप के नीचे कन्या पक्ष के किसी दम्पति द्वारा भावी दम्पति की सुख-समृद्धि की कामना , वर-वधू की प्रदक्षिणा करते हुए चारों ओर धान बिखेरकर की जाती है |यह वास्तव में एक प्रतीकात्मक तांत्रिक अनुष्ठान है |
                  पुराने समय में आवागमन के आधुनिक साधनों के आभाव में बैलगाड़ियाँ यात्रा सबसे सुलभ साधन थीं |चूँकि बैलगाड़ियों से यात्रा पूरी करने में काफी समय बीतता था इसलिए कन्या-पक्ष द्वारा वर-वधू और बारातियों(वर-यात्रियों )के लिए पाथेय(रास्ते के लिये नाश्ता ) साथ रखा जाता था |ये पाथेय सभी जगहों पर  सहजता से सुलभ बांस से बने बड़े टोकरों में रखा जाता था |आज यह समूचा परिदृश्य बदल चुका है लेकिन बांस के बने टोकरे ,पंखे इत्यादि  देने का चलन बदस्तूर जारी है |
                दूल्हा-दुल्हन शब्द बड़े ही अर्थ-गंभीर हैं जो संस्कृत के दुर्लभ शब्द से विकसित हुए हैं | दूल्हा ,दुल्हन की तलाश में कितना श्रम करना पड़ता है और कितने पापड़ बेलने पड़ते हैं ,यह तो  कोई भुक्तभोगी ही जान सकता है | बड़े संघर्षों के बाद कहीं हाथ पीले हो पाते है |दुल्हे का दुल्हन के घर हथियारों से सज्जित होकर घोड़े पर चढ़कर चढ़ाई करना यही तो दर्शाता है |

सोमवार, 24 फ़रवरी 2014

ऐसी दिलदारी प्रणम्य है



दौलतमंद लोग दिलदार भी हों ऐसा कतई जरुरी नहीं है ,लेकिन असली दौलतमंद वही होते हैं जिनके पास दिल की दौलत होती है |क्योंकि दौलत तो तिकड़म करके भी हासिल हो सकती है लेकिन दिलदारी संस्कारों से ही मिलती है |दौलत यों तो हरेक की चाहत और जरुरत है लेकिन दौलतमंदों में दौलत की ख्वाहिश कुछ ज्यादा ही होती है और उनकी यह चाहत 'मर्ज बढ़ता गया ,ज्यों-ज्यों दवा की ' की तर्ज पर बढ़ती ही जाती है |और मौका जब बेटे के विवाह का हो तब तो उनके अरमान ही मचल उठते हैं |वे अपने बेटे के जन्म ,लालन-पालन ,पढाई-लिखाई और शादी पर होने वाले प्रत्याशित खर्च की पूरी भरपाई करने को छटपटा उठते हैं | उनका ज़ोर होने वाली वधू से ज्यादा मिलने वाले दहेज़ पर होता है |उनके लिए वधू के मामले में तो उन्नीस-बीस चल सकता है लेकिन दहेज़ के मामले में कतई नहीं |मानो विवाह का मकसद  वधू  लाना  न होकर ,दहेज़ हासिल करना रह गया हो  |
                     लेकिन कुछ लोग ऐसे भी होते है जो इन सब बातों को झुठलाते हुए सुखद उदाहरण प्रस्तुत करते हैं |मेरे एक अधिवक्ता मित्र की पुत्री का विवाह एक हाई-प्रोफाइल एन.आर.आई. के साथ हुआ है |इस विवाह  पर अविश्विसनीय रूप से मात्र एक लाख रूपये व्यय हुए |अमेरिका में शिक्षित उनका दामाद नाईजीरिया में सॉफ्टवेयर इंजीनियर है और उसके सगे सम्बन्धी भारत में महत्वपूर्ण पदों पर पदस्थ हैं | मेरे एक अन्य पत्रकार मित्र की पुत्री का विवाह फौजी पृष्ठभूमि वाले एक हाई-प्रोफाइल कश्मीरी कौल परिवार में हुआ है |उनका दामाद भारतीय सेना में लेफ्टिनेंट कर्नल है | पूरा परिवार अत्यंत भद्र है |इस विवाह में भी अविश्वसनीय रूप से लगभग एक लाख रूपये व्यय हुए | दोनों ही प्रकरणों में दहेज़ का कोई लेनदेन नहीं हुआ | क्योंकि वर पक्ष के लोगों ने कन्या पक्ष की आर्थिक स्थिति को ध्यान में रखते हुए किसी भी प्रकार के लेनदेन से इंकार कर दिया था और सुशील,सुन्दर व सुशिक्षित वधू  पर अपना फोकस रखा | ऐसे उदाहरण विरल भले हों लेकिन रेगिस्तान में किसी मीठे पानी के चश्मे की तरह राहत  देने वाले होते हैं | ऐसी दिलदारी अनुकरणीय और प्रणम्य है |हम में से कई लोग जाने अनजाने में दहेज़ का महिमामंडन कर उसे प्रछन्न प्रोत्साहन देते हैं जो नितांत गलत है | अमीरों द्वारा किया गया वैभव-प्रदर्शन उदहारण योग्य नहीं हो सकता | उनकी तो  सिर्फ सादगी ही उदाहरण योग्य होती है |अमीरों द्वारा वैभव-प्रदर्शन तो सामान्य बात है लेकिन उनका सादगी का निर्वाह उल्लेख्य होता है क्योंकि 'महाजनो येन गतः स पन्थः' ||

मंगलवार, 18 फ़रवरी 2014

बाराती :एक व्यंग

बाराती का नाम जेहन में आते ही शरीर में सिहरन-सी दौड़ जाती है |बाराती की अपनी ही निराली शान होती है |जैसे वसंत ऋतू में युवा-बूढ़े सबकी आँखों में एक गुलाबी खुमार होता है और मन में उल्लास की नदी अपने तटों को तोड़ती बहती है वैसी ही मनोदशा एक बाराती की होती है |उसकी शान और ठाठबाट काबिलेगौर होते हैं |जनवासे की चाल का मुहावरा तो मशहूर ही है | गजगामिनी गति से चलते ,ज़माने भर की ऐंठ को अपने में समेटे बाराती को देखना एक अनूठे अनुभव से कम नहीं होता |
                                                                                          घर में बालों में कडुआ तेल मलने वाले लोग बरातों में हेयर केयर तेल की मांग करते दिखते हैं |चढ़ाई के लिए तैयार होते वक्त अपने बदन पर दोस्त के डिओ को लोग ऐसे निचोड़ते हैं कि बेचारा डिओ भी शरमा जाता है | वे मई जून की गरमी में भी कोट पहनने का मौका नहीं चूकते | भले ही  मौसम की वजह से असहज हो जायें  लेकिन फिर वे कोट पहने भी कब ? आखिर अपनी शादी के कोट का उपयोग तो करना ही है |
                                                           इन दिनों शादियों में बुफे का प्रचलन ज्यादा बढ़ रहा है | बुफे में स्टाल पर सजी मेलामाईन की प्लेटों के साथ रखे पेपर नेपकिन को लोग उठा तो लेते हैं लेकिन कहीं वह गन्दा या ख़राब न हो इसका पूरा ख्याल रखते हैं और डस्टबिन में जूठी प्लेट रखते वक्त उस पेपर नेपकिन को भी 'ज्यों की त्यों धर दीन्ही चदरिया ' की तर्ज पर उसमें डाल देते हैं |
                                                                                    'मालेमुफ्त दिले बेरहम' को सार्थक करते हुए कुछ बाराती खाली प्लेट हाथ में लेकर पहले सभी स्टालों का निरीक्षण करते हैं और फिर पसंदीदा व्यंजनों का लुत्फ़ उठाते हुए ,घूम-घूम कर बतियाते हुए या यहाँ वहाँ बैठकर किश्तों में और इत्मीनान से खाना खाने का विकल्प चुनते है | महिलायें अक्सर चाट के स्टालों के इर्दगिर्द ही  जुटीं नज़र आती हैं | इन स्टालों तक किसी अन्य का पहुँचना ,राशन की दुकान से राशन लेने से कम  दुष्कर नहीं होता | इसलिए असुविधा और मारामारी से बचने के लिए कई लोग अपनी प्लेट में एकबारगी इतना सारा खाना रख लेते हैं कि उनकी प्लेट देखकर अन्नकूट की पूजा की थाली का भ्रम होता है | ऐसे नज़रे भी देखने को मिलते हैं कि पान की गिलोरी चबाते बाराती को जब गरम दूध का कड़ाह नज़र आता है तो वह पान थूककर दूध का लुत्फ़ उठाने लगता है |छक कर  खाने के बाद जनवासे में आराम करते बारातियों के उथल-पुथल मचाते पेट से जब मीथेन और हाइड्रोजन रिलीज होती है तो वहां का मंजर वर्णनातीत होता है |

सोमवार, 28 अक्तूबर 2013

विज्ञानवेत्ता भी विज्ञानचेता बनें |

विज्ञानवेत्ता या विज्ञानविद सामान्यतः वे लोग कहलाते हैं जो विज्ञान की गहरी जानकारी रखते हैं या विज्ञान के अंतर्गत किसी विषय का विशद अनुप्रयोगात्मक ज्ञान रखते हैं |हालाँकि हर विज्ञानविद को विज्ञान की अपनी समझ को दैनंदिन व्यवहार में अपनाना चाहिए लेकिन दुर्भाग्यवश ऐसा नहीं है |जीवन-व्यवहार में हमें इसका उलट ही देखने को ही मिलता है |यह विडम्बना ही तो है कि उपग्रह प्रक्षेपण के पहले उसके निर्माता वैज्ञानिक धार्मिक अनुष्ठान संपन्न कर अपने मिशन की सफलता की कामना करते हैं |
                                                                                                                 आज फलित ज्योतिष के प्रति सामान्य जन से ज्यादा कहीं डॉक्टर और इंजिनियर आकर्षित हो रहे हैं और उसे शौकिया तौर पर या अनुषंगी व्यवसाय के रूप में अपना रहे हैं |विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में इस आशय के विज्ञापन सहज ही देखे जा सकते हैं |एक ऐसा व्यक्ति जो भौतिक विज्ञान या रसायन विज्ञान जैसे विषय में डाक्टरेट किये हो ,बिल्ली के रास्ता काटने पर यों ठिठक जाये मानो किसी ने विस्फोटक सुरंग बिछा रखी हो तो क्या उसे वैज्ञानिक चेतना संपन्न या विज्ञानचेता कहा जा सकता है ?मेरे विचार में कतई नहीं |क्योंकि विज्ञानविद होते हुए भी वह न सिर्फ अंधविश्वासों को ढो रहा है बल्कि उनका पोषण भी कर रहा है |शुभ कार्य आरंभ होने के पहले किसी के छींकने  भर से अज्ञात अनिष्ट की आशंका से लोग विचलित हो जाते हैं |किसी भी तर्क से इसे सही नहीं ठहराया जा सकता है
            विज्ञान प्रत्यक्ष को ही प्रमाण मानता है इसलिए तर्कसिद्ध ,सत्यापनीय तथ्य ही उसके लिए प्रमाण योग्य हैं |लिहाजा वह किसी भौतिकेतर सत्ता में विश्वास नहीं करता और फलतः मरणोत्तर जीवन को पूरी तरह  से नकारता है |उसका आग्रह तो काल्पनिक स्वर्ग को धरती पर ही प्रतिस्थापित करने का है |विज्ञान के मानने वालों को उसके इस सार को भी आत्मसात करना चाहिए तभी हम सही अर्थों में वैज्ञानिक चेतना संपन्न या विज्ञानचेता बन सकते हैं |
                                    अंधविश्वासों का पोषण करने वाली परम्पराओं या रुढियों को  संस्कृति के नाम पर ढोना उचित नहीं कहा जा सकता |ऐसी कालबाह्य रुढियों के नकार से संस्कृति खतरे में नहीं पड़ जाएगी और न ही हमारा गौरव धूमिल होगा |मनुष्य के लिए बेहतर संसार और समाज का निर्माण करना ही विज्ञान का एकमेव और अंतिम लक्ष्य है |कम-से-कम विज्ञान से जुड़े लोगों को तो तर्कजीवी ,परिपक्व और  वैज्ञानिक चेतना संपन्न होना चाहिए ताकि दूसरों के लिए वे उदहारण बन सकें और हमारा जीवन सुखमय और तर्कसमृद्ध बन सके ||

बुधवार, 23 अक्तूबर 2013

सपने

सपने सभी देखते हैं ,आम भी और खास भी |कुछ खुली आँखों से सपने देखते हैं और कुछ  बंद आँखों से |सपनों की अपनी दुनियां है ,सजीली और नयनाभिराम |महात्मा गाँधी ने भी एक सपना देखा था |एक ऐसे आत्मनिर्भर और शोषणमुक्त भारत का सपना ,जिसमें समाज के निचले पायदान पर खड़े अंतिम व्यक्ति को भी समान महत्व मिलेगा |जिसमें सामाजिक न्याय की प्रतिष्ठा होगी |लेकिन जो हश्र गाँधी का हुआ ,वही उनके सपने के साथ हुआ |उनका गुणानुवाद करने वाले लोगों ने ही उनके  सपने की हत्या कर दी |
                                                                                                                    आम आदमी भी सपने देखते हैं लेकिन उनके सपने उन्हीं की तरह आम होते हैं | वह सिर पर एक छत  ,दो  वक्त की रोटी की आसान जुगाड़ ,बूढी माँ का इलाज ,एक पुरानी या नई बाईसकिल खरीदने जैसे सपने देखता है |जब उनके ये सपने फलित होते हैं तो वे अपना जीवन सफल और धन्य मानते हैं और सपनों के तार-तार होने पर मानो उनकी जिंदगी बिखर जाती है |
                                खास लोगों के सपने खास होते हैं |देश में और विदेश में औद्योगिक साम्राज्य खड़ा करना ,धनकुबेर बनकर विलासिता का जीवन जीना ,किसी कमाऊ क्षेत्र में अपनी नियुक्ति का जुगाड़ ,राजनीतिक क्षत्रप बनकर राज्य सत्ता का निर्बाध सुख भोग -जैसे खास सपने उनकी आँखों में सजते हैं ,जिन्हें वे खुली आँखों से देखते हैं और उन्हें अपने जीवन में फलित करने के लिए प्राणपण से जुट जाते हैं |
                                                                                                                               आम लोग अक्सर बंद आँखों से सपने देखते हैं जबकि खास लोग खुली आँखों से सपने देखते हैं |सपने जब करवटें बदलते हैं या बिखरते हैं तो जीना मुश्किल हो जाता है |सपनो के बिखरने का  दर्द तोड़कर रख देता है |सपने हमारे जीवन में एक आश्वासन की तरह होते हैं जो भले ही झूठे हों लेकिन हमें बहुत संबल देते हैं |कुछ सपने सार्वजनिक जीवन में हलचल मचा देते हैं |इन्हीं में से एक सपना मोदी का है तो दूसरा शोभन सरकार का |इन दिनों सार्वजनिक प्रचार माध्यमों में इन सपनों को जरुरत से ज्यादा स्पेस मिल रहा है |डोंडीया खेड़ा में राजा राव रामबख्स सिंह के खजाने की बात उस इलाके के सभी बुजुर्ग लोगों को पता है |अभिलेखों में भी इस तथ्य का उल्लेख है |अंग्रेज अफसरों ने खजाने का पता लगाने के लिए राजा राव रामबख्स सिंह को कठोर यातनाएं देकर मार डाला लेकिन खजाने का पता हासिल नहीं कर सके |अनुमान है कि खजाना किले में ही कहीं दबा पड़ा है लेकिन उसके वास्तविक स्थान का पता न तो शोभन सरकार को है और न पुराविदों को |सर्वेक्षण के दौरान कोई धातु भूगर्भ में दबी होने के संकेत मिलने पर उन्होंने कुछ स्थलों को चिन्हित किया है ,जहाँ खुदाई जारी है |शोभन सरकार के सुनहले सपने पर दूसरे स्वप्नद्रष्टा मोदी जी ने सवाल उठाया और उसका मजाक उड़ाया |लेकिन जब उन्हें इस बात का अहसास हुआ कि शोभन सरकार के लाखों की संख्या में भक्त हैं और उनके सपने की सार्वजनिक तौर पर खिल्ली उड़ाने पर कहीं उनका सपना न बिखर जाये तो उन्होंने इस बात की गंभीरता को समझा और अपना दूत भेजकर उनसे क्षमा याचना की |
                                                   सपने लोगों को गुमराह भी करते हैं जैसाकि हम देख रहे हैं लेकिन ये तो खास लोगों की बात हुई |आम लोग कब खुली आँखों से सपने देखना शुरू करेंगे ??

शनिवार, 19 अक्तूबर 2013

सलूनो,भुजरिया और चांदमारी

सलूनो ,भुजरिया और चांदमारी के इस त्रिकोण का सामाजिक ,सांस्कृतिक और आर्थिक  महत्व है |सलूनो या रक्षाबंधन का महात्म्य तो सर्वविदित है |इसके आयोजन के उद्देश्य का निरूपण करने वाली अनेक लोक कथाएं प्रचलित हैं ,जिनमें पाठभेद और कथाभेद दोनों मिलता है |लेकिन कलेवर विस्तार के भय से उन सब का वर्णन करना यहाँ अभीष्ट नहीं है |पर उन सभी का सारांश यह है कि अपने प्रियजन की कुशलक्षेम की कामना से उन्हें अभिमंत्रित सूत्र बांधा जाता है ,जो रक्षासूत्र कहलाता है और जो प्रायः बहिनें अपने भाई को बांधतीं हैं |प्रतिदान में भाई भी बहिनों को यथेष्ट दक्षिणा देकर उनकी सुरक्षा का दायित्व ओढ़ता है |इस अवसर पर भुजरिया -जो जौ या गेंहू इत्यादि के नन्हे पौधे होते हैं ,का आदान-प्रदान किया जाता है और उन्हें देवी माँ को अर्पित किया जाता है और अच्छी फसल व धन-धान्य की कामना की जाती है |कुछ लोग इसे मृदा परीक्षण या बीज परीक्षण का आदिम तरीका मानते हैं लेकिन यह वास्तव में एक तांत्रिक अनुष्ठान है जो अच्छी फसल की कामना से लोक देवी को लक्षित कर किया जाता है |जिससे दैवी अनुकम्पा प्राप्त हो और प्राकृतिक प्रकोपों से फसलें संरक्षित रहें |चांदमारी का भी इस पर्व से अनोखा रिश्ता है |इसमें जलाशयों के किनारे स्थानीय लोगों द्वारा युद्ध कौशल का प्रदर्शन किया जाता है |निशानेबाजी की जाती है |चकरी मेले और अखाड़े आयोजित किये जाते हैं तथा इन सब का उद्देश्य उन जलस्रोतों पर जो  उनके पीने के पानी और फसलों की सिंचाई के प्रमुख स्रोत रहे हैं ,पर प्रतीकात्मक रूप से अपना सामूहिक आधिपत्य जतलाना होता है ताकि कोई ग्रामेतर अन्य व्यक्ति उनकी बिना अनुमति के जलाशयों के जल का उपयोग करने का दुस्साहस न कर सके |आज के परिप्रेक्ष्य में तो यह बात और भी सटीक व प्रासंगिक मालूम होती है |पानी को लेकर आये दिन तलवारें खिंचती हैं और द्वंद्व मचता है ,फिर चाहे यह मामला व्यक्तियों के बीच का हो या राज्यों के बीच का |चूँकि यह पर्व श्रावण मास में याने वर्षा ऋतू में मनाया जाता है इसलिए जल संग्रहण और उसके संरक्षण के महत्व को सहज ही समझा जा सकता है | 

शुक्रवार, 18 अक्तूबर 2013

मतदाता की जान सांसत में है !

चार राज्यों में चुनावी बिगुल बजने के साथ ही सियासी हलचलों का दौर शुरू हो गया |चुनाव जो लोकतंत्र का महापर्व है,कुछ लोगों के लिए उत्सव जैसा है |चुनाव से जुड़े कारोबारियों के चेहरे खिल गए हैं और जिन  सैंकड़ों लोगों का बिना मेहनत की रोटी का जुगाड़ हो गया है ,उनकी वाछें खिल उठी  हैं |
                                                                                                                 लेकिन हजारों लोग भी हैं जिनकी जान सांसत में है |दबंगों के इस चुनावी सिर फुटव्वल में उन्हें अपनी मुसीबत नजर आ रही है |सभी दबंगों ने अपनों पर दबाव बनाना और बढ़ाना शुरू कर दिया है |उनसे कसमें खिलाई जा रही हैं ,वादे लिए जा रहे हैं और तमामतर अहसान गिना कर उन्हें भुनाने के लिए पूरी तरह से कमर कसी जा रही है |एक-एक वोटर पर इन दबंगों की गृद्ध-दृष्टि है |उनके पास मोहल्लेबार ,वार्डबार ,और जतिबार पूरे निर्वाचन क्षेत्र की विशेष तौर पर तैयार कराई गई मतदाता सूचियाँ हैं |विरोधियों से सहानुभूति रखने वाले मतदाताओं को चिन्हित कर उन्हें घेरा जा रहा है |साम,दाम,दंड ,भेद सभी हथकंडे अपनाये जा रहे हैं |किस शख्स का कितना वजन है ,कौन कितने पैसों में बिक सकता है ,किस की रिश्तेदारी में पैठ लगाकर उन्हें काबू किया जा सकता है इसका विस्तृत आकलन तैयार किया जा रहा है |चारों ओर जासूस तैनात हैं ,जो आम लोगों की न सिर्फ नब्ज टटोल रहे हैं बल्कि उन पर पैनी नजर रखे हुए हैं और उन्हें चौबीसों घंटे सूंघकर उनका रुझान पता करने की कोशिशों में जुटे हैं |
                                                                                                                                         तो अब यह समझने में कोई कठिनाई नहीं होनी चाहिए कि आम लोगों की जान सचमुच सांसत में है |वे न खुलकर इन मुद्दों पर बात कर सकते हैं और न आपस में कोई मशविरा कर सकते हैं क्योंकि दीवारों के भी कान होते हैं |बहुत मुमकिन है कि आपके घर में ही कोई जासूस हो जो आपकी दैनंदिन गतिविधियों को नोट कर अपने आका को रिपोर्ट कर रहा हो ?इतना अविश्वास और संशय पहले कभी नहीं था |खुलकर विरोध करने या अपना पक्ष चुनने वालों को उसकी कीमत चुकानी पड़ जाती है |जिसकी भरपाई का आश्वासन वह शख्स देता है ,जिसके पक्ष में वह खड़ा होता है |लेकिन चुनाव जीतने और चुनाव बीतने के बाद भी उनकी नज़रे-इनायत ऐसी ही बनी रहेगी ,इस बात की शंका उस आश्वस्त व्यक्ति के मन में भी घर किये रहती है |किसी को जोतदारी से छुट्टी की धमकी मिलती है तो किसी को खेत की मेंड़ से न निकलने देने की गंभीर चेतावनी |मतदाता इस बात को बखूबी समझने लगा है कि चुनाव वही प्रत्याशी जीतेगा ,जिसका मेनेजमेंट बेहतर होगा |अब जन समर्थन का ज्यादा महत्व नहीं है !क्योंकि यदि  चुनाव जनआकांक्षाओं की वास्तविक अभिव्यक्ति होते तो आज हिन्दुस्तान की तस्वीर कुछ और ही होती |