बुधवार, 8 अगस्त 2012

गुरुवर्य पंडित गोपालदास वरैया

जैन-जाग्रति के पुरस्कर्ताओं की पंक्ति में एक उल्लेखनीय नाम स्यादवादवारिधि,वादीगजकेशर,न्यायवाचस्पति,गुरुवर्य पंडित गोपालदास वरैया का है |पंडित जी का जन्म विक्रम संवत १९२३ में आगरा में श्री लक्ष्मण दास जी जैन के घर हुआ था |आपके पिता की आर्थिक स्थिति बहुत सामान्य थी |जिसके कारण उन्होंने साधारण अंग्रेजी स्कूल में सामान्य शिक्षा प्राप्त की और आजीविका के लिए रेलवे में क्लर्क की नौकरी कर ली |पंडित जी की पत्नी बहुत कर्कश स्वभाव की थी फिर भी उन्होंने कभी भी अपने जीवन की इस कडुवाहट को सार्वजानिक व्यवहार में नहीं आने दिया |पंडित जी के जीवन का पूर्वार्ध भटकाव से भरा और प्रायः निरर्थक रहा |एक दिन किसी विद्वान के शास्त्र प्रवचन सुनकर उनके मन पर इसका बड़ा सकारात्मक प्रभाव पड़ा जिसने उनके जीवन की दिशा ही बदल दी |मानो उनके भीतर छिपी प्रतिभा को प्रस्फुटन के लिए अनुकूल आधार-भूमि मिल गयी |इसके पश्चात् श्रुताभ्यास में निरंतर संलग्न होकर उन्होंने दिगंबर जैन परंपरा के शास्त्रों का गंभीर अध्ययन ,मनन किया और उनमें निपुणता प्राप्त करते हुए संस्कृत और प्राकृत भाषाओँ पर पूर्ण अधिकार प्राप्त कर लिया |आर्ष ग्रंथों की सहायता से उन्होंने जैन सिद्धांत ,तत्वज्ञान ,दर्शन और न्याय को हस्तामलकवत कर लिया |
                    जैन दर्शन के ध्वजवाहक बनकर आपने यत्र-तत्र अनेक जैन पत्र-पत्रिकाओं का संपादन किया |जिनमें दिगंबर जैन महासभा मुंबई का प्रकाशन 'जैन-मित्र' विशेष है |पंडित जी के संपादकत्व में जैनमित्र ने अखिल जैन समाज का पहरुआ बनकर न केवल उसे एक सूत्र में पिरोने का काम किया बल्कि उसकी अस्मिता को एक नई पहचान दी |आपने कई सफल शास्त्रार्थ किये और अपनी वाग्मिता से अजैनों को भी मुग्ध कर दिया |उन्होंने अपनी विलक्षण मेधा से जैन न्याय और सिद्धांत की दुन्दुभी बजाते हुए जैन दर्शन की विमल कीर्ति पताका को फहराया और शैक्षिक क्रांति के अग्रदूत बने |
                       मुरैना का जैन सिद्धांत संस्कृत महाविद्यालय आपकी कीर्ति का मुख्य स्तम्भ है |यह कहना अतिशयोक्ति न होगी कि आज भारतवर्ष में जितने भी जैन विद्वान् हैं उनमें से अधिकांश पंडित जी की शिष्य -प्रशिष्य परंपरा में हैं |
                       समाज सेवा और शिक्षण कार्य में अत्यधिक व्यस्त रहते हुए भी वे अवकाश के क्षणों में चिंतन-मनन करते रहते थे जो 'जैन सिद्धांत दर्पण' सुशीला उपन्यास और जैन सिद्धांत प्रवेशिका के प्रणयन के रूप में हमारे सामने है |इनमें से बहुप्रसारित जैन सिद्धांत प्रवेशिका जैन धर्म और दर्शन के विद्यार्थियों के लिए बहुत उपयोगी है ,जो एक पारिभाषिक कोष का काम देती है||