सोमवार, 12 सितंबर 2011

कंक्रीट के जंगल

कंक्रीट के जंगल उभरे ,बढ़ी यहाँ अनियंत्रित भीड़
बदन हुआ धरती का नंगा ,कहाँ बनायें पक्षी नीड़
चीरहरण होना धरती का हुई आज साधारण बात
अपनी वज्रदेह पर फिर भी सहती वह कितने संघात
इतने उत्पीड़न ;सहकर भी जो करती अनगिन उपकार
उसके ही सपूत उससे करते ऐसा गर्हित व्यवहार
दोहन पर ही हमने केवल केन्द्रित रखा समूचा ध्यान
जंगल कब से चीख रहे हैं ,कोई नहीं दे रहा कान
पर्यावरण ले रहा करवट ,पनघट का रूठा पानी
ऋतुएँ लगती हैं परदेशी ,जो कल तक थीं पहचानी
आँगन ,गली ,मोहल्ला ,क़स्बा सबने आज सवाल किया |
हरीभरी धरती का इतना बदतर क्यों कर हाल किया ||
श्रीश राकेश

3 टिप्‍पणियां:

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  2. बहुत ही भाव पूर्ण चिंतन ...अपनी धरती माँ के आँचल में सुरक्षित रहे हम और उसी धरती माँ का दोहन करने का कार्य निरंतर कर रहे हैं कितना कृतघ्न हो गए हम ..हमे भी उसकी सुरक्षा और सेवा करनी चाहिए ...बधाईयां आपको

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  3. गंभीर विचार से भरी कविता हमको बहोत भाई |धन्यवाद |

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