शनिवार, 19 अक्टूबर 2013

सलूनो,भुजरिया और चांदमारी

सलूनो ,भुजरिया और चांदमारी के इस त्रिकोण का सामाजिक ,सांस्कृतिक और आर्थिक  महत्व है |सलूनो या रक्षाबंधन का महात्म्य तो सर्वविदित है |इसके आयोजन के उद्देश्य का निरूपण करने वाली अनेक लोक कथाएं प्रचलित हैं ,जिनमें पाठभेद और कथाभेद दोनों मिलता है |लेकिन कलेवर विस्तार के भय से उन सब का वर्णन करना यहाँ अभीष्ट नहीं है |पर उन सभी का सारांश यह है कि अपने प्रियजन की कुशलक्षेम की कामना से उन्हें अभिमंत्रित सूत्र बांधा जाता है ,जो रक्षासूत्र कहलाता है और जो प्रायः बहिनें अपने भाई को बांधतीं हैं |प्रतिदान में भाई भी बहिनों को यथेष्ट दक्षिणा देकर उनकी सुरक्षा का दायित्व ओढ़ता है |इस अवसर पर भुजरिया -जो जौ या गेंहू इत्यादि के नन्हे पौधे होते हैं ,का आदान-प्रदान किया जाता है और उन्हें देवी माँ को अर्पित किया जाता है और अच्छी फसल व धन-धान्य की कामना की जाती है |कुछ लोग इसे मृदा परीक्षण या बीज परीक्षण का आदिम तरीका मानते हैं लेकिन यह वास्तव में एक तांत्रिक अनुष्ठान है जो अच्छी फसल की कामना से लोक देवी को लक्षित कर किया जाता है |जिससे दैवी अनुकम्पा प्राप्त हो और प्राकृतिक प्रकोपों से फसलें संरक्षित रहें |चांदमारी का भी इस पर्व से अनोखा रिश्ता है |इसमें जलाशयों के किनारे स्थानीय लोगों द्वारा युद्ध कौशल का प्रदर्शन किया जाता है |निशानेबाजी की जाती है |चकरी मेले और अखाड़े आयोजित किये जाते हैं तथा इन सब का उद्देश्य उन जलस्रोतों पर जो  उनके पीने के पानी और फसलों की सिंचाई के प्रमुख स्रोत रहे हैं ,पर प्रतीकात्मक रूप से अपना सामूहिक आधिपत्य जतलाना होता है ताकि कोई ग्रामेतर अन्य व्यक्ति उनकी बिना अनुमति के जलाशयों के जल का उपयोग करने का दुस्साहस न कर सके |आज के परिप्रेक्ष्य में तो यह बात और भी सटीक व प्रासंगिक मालूम होती है |पानी को लेकर आये दिन तलवारें खिंचती हैं और द्वंद्व मचता है ,फिर चाहे यह मामला व्यक्तियों के बीच का हो या राज्यों के बीच का |चूँकि यह पर्व श्रावण मास में याने वर्षा ऋतू में मनाया जाता है इसलिए जल संग्रहण और उसके संरक्षण के महत्व को सहज ही समझा जा सकता है | 

शुक्रवार, 18 अक्टूबर 2013

मतदाता की जान सांसत में है !

चार राज्यों में चुनावी बिगुल बजने के साथ ही सियासी हलचलों का दौर शुरू हो गया |चुनाव जो लोकतंत्र का महापर्व है,कुछ लोगों के लिए उत्सव जैसा है |चुनाव से जुड़े कारोबारियों के चेहरे खिल गए हैं और जिन  सैंकड़ों लोगों का बिना मेहनत की रोटी का जुगाड़ हो गया है ,उनकी वाछें खिल उठी  हैं |
                                                                                                                 लेकिन हजारों लोग भी हैं जिनकी जान सांसत में है |दबंगों के इस चुनावी सिर फुटव्वल में उन्हें अपनी मुसीबत नजर आ रही है |सभी दबंगों ने अपनों पर दबाव बनाना और बढ़ाना शुरू कर दिया है |उनसे कसमें खिलाई जा रही हैं ,वादे लिए जा रहे हैं और तमामतर अहसान गिना कर उन्हें भुनाने के लिए पूरी तरह से कमर कसी जा रही है |एक-एक वोटर पर इन दबंगों की गृद्ध-दृष्टि है |उनके पास मोहल्लेबार ,वार्डबार ,और जतिबार पूरे निर्वाचन क्षेत्र की विशेष तौर पर तैयार कराई गई मतदाता सूचियाँ हैं |विरोधियों से सहानुभूति रखने वाले मतदाताओं को चिन्हित कर उन्हें घेरा जा रहा है |साम,दाम,दंड ,भेद सभी हथकंडे अपनाये जा रहे हैं |किस शख्स का कितना वजन है ,कौन कितने पैसों में बिक सकता है ,किस की रिश्तेदारी में पैठ लगाकर उन्हें काबू किया जा सकता है इसका विस्तृत आकलन तैयार किया जा रहा है |चारों ओर जासूस तैनात हैं ,जो आम लोगों की न सिर्फ नब्ज टटोल रहे हैं बल्कि उन पर पैनी नजर रखे हुए हैं और उन्हें चौबीसों घंटे सूंघकर उनका रुझान पता करने की कोशिशों में जुटे हैं |
                                                                                                                                         तो अब यह समझने में कोई कठिनाई नहीं होनी चाहिए कि आम लोगों की जान सचमुच सांसत में है |वे न खुलकर इन मुद्दों पर बात कर सकते हैं और न आपस में कोई मशविरा कर सकते हैं क्योंकि दीवारों के भी कान होते हैं |बहुत मुमकिन है कि आपके घर में ही कोई जासूस हो जो आपकी दैनंदिन गतिविधियों को नोट कर अपने आका को रिपोर्ट कर रहा हो ?इतना अविश्वास और संशय पहले कभी नहीं था |खुलकर विरोध करने या अपना पक्ष चुनने वालों को उसकी कीमत चुकानी पड़ जाती है |जिसकी भरपाई का आश्वासन वह शख्स देता है ,जिसके पक्ष में वह खड़ा होता है |लेकिन चुनाव जीतने और चुनाव बीतने के बाद भी उनकी नज़रे-इनायत ऐसी ही बनी रहेगी ,इस बात की शंका उस आश्वस्त व्यक्ति के मन में भी घर किये रहती है |किसी को जोतदारी से छुट्टी की धमकी मिलती है तो किसी को खेत की मेंड़ से न निकलने देने की गंभीर चेतावनी |मतदाता इस बात को बखूबी समझने लगा है कि चुनाव वही प्रत्याशी जीतेगा ,जिसका मेनेजमेंट बेहतर होगा |अब जन समर्थन का ज्यादा महत्व नहीं है !क्योंकि यदि  चुनाव जनआकांक्षाओं की वास्तविक अभिव्यक्ति होते तो आज हिन्दुस्तान की तस्वीर कुछ और ही होती | 

भ्रष्टाचार और चुनाव में चोली दामन का रिश्ता है !

भ्रष्टाचार बढ़ रहा यों ,ज्यों सुरसा का विस्तार |
नेताओं की  माया से  भगवान  भी  गया  हार ||
अग्निमुखी,कलियुगी देव सब चट कर जाते हैं |
बड़े  चाव  से  चारा  और  कोयला  खाते   हैं  ||
बेशर्मी  भी  इन  बेशर्मों  से  शरमाती   है   |
हिन्स्रपशु से भी निकृष्ट धनपशु की जाति है ||
चहुंमुखी प्रगति के बावजूद छाई अमावस्या है |
भ्रष्टाचार   बना है  क्योंकि  बड़ी  समस्या   है  ||
जब  चुनाव में  लाखों  रुपये  खर्च  करेंगे  लोग |
खुलकर हो  काले धन का निर्वाचन में उपयोग ||
क्यों फिर भ्रष्टाचार बने ना महाभयानक रोग |
क्योंकि जीतने पर अपनी ही जेब भरेंगे लोग ||
कम  खर्चीले  हों  चुनाव , इसलिए  जरुरी  है |
वरना  भ्रष्टाचार  यहाँ  समझो  मज़बूरी   है ||      
                                         
                                     
                                       
                                           
                                         
                                         
                                               
                                         
                                     
                                               
                                     
                                  

बुधवार, 11 सितंबर 2013

एक सवाल

चालीस-आठ  लाशों  के  ऊँचे  ढेर पर |
कुछ तो बोलो ,इस प्रायोजित अंधेर पर ||
भाजपा, सपा, बसपा  सारे  हैं  मौन   |
है  धुला  दूध  का  बोलो  इनमें  कौन ||
सेंके  सबने  इस  दावानल  में  हाथ  |
है  दिया  आततायी  लोगों  का साथ ||
सबने मिल  रौंदी  भाईचारे की छाती |
कर डाली तहस-नहस गंगा-जमुनी थाती ||
इन घड़ियाली आंसूओं का अब क्या मानी|
पहले की  आगजनी ,फिर डाल रहे पानी  ||
लोगों  का   नेताओं  पर   नहीं भरोसा है  |
सब ने दंगों के लिए इन्हीं  को कोसा है ||
ये क्या पीड़ित लोगों को न्याय दिलाएंगे |
आधी  सहायता तो ये  ही  खा  जायेंगे ||

          श्रीश राकेश जैन |

दंगों के विरोध में

नफरत की विषबेल ये ,यहाँ किसने आकर बोई |
लहू बहा है किसका ,देख बता सकता क्या कोई ?
छोटी-छोटी बातों को ,फिर तूल दे रहे लोग    |
यह सोची-समझी साजिश है,नहीं महज संयोग ||
सिर पर देख चुनाव ,सियासी लोग चल गए चाल |
जाति,धर्म की चिंगारी ,दी जानबूझ कर डाल  ||
कितने मासूमों ने अपने अभिभावक खोये हैं ?
कितने बूढ़े बापों ने  , बेटों के शव ढोए हैं   ??
जोह रहे हैं कितने ही परिजन अपनों की राह ?
लगा दरकने उनके भी अब चेहरे का उत्साह ||
बेकसूर लोगों की ,  जब भी हत्या होती है   |
धरती माता पीट-पीट कर छाती रोती है  | |
हिन्दू हों या मुसलमान ,हैं भारत माँ के लाल |
मचा हुआ है जाति धर्म पर फिर क्यों यहाँ बवाल ||
इन टूटे लोगों को फिर से खड़ा करेगा कौन ?
किंकर्तव्यविमूढ़ राज्य है इस सवाल पर मौन ||
                               श्रीश राकेश जैन |

बुधवार, 8 अगस्त 2012

गुरुवर्य पंडित गोपालदास वरैया

जैन-जाग्रति के पुरस्कर्ताओं की पंक्ति में एक उल्लेखनीय नाम स्यादवादवारिधि,वादीगजकेशर,न्यायवाचस्पति,गुरुवर्य पंडित गोपालदास वरैया का है |पंडित जी का जन्म विक्रम संवत १९२३ में आगरा में श्री लक्ष्मण दास जी जैन के घर हुआ था |आपके पिता की आर्थिक स्थिति बहुत सामान्य थी |जिसके कारण उन्होंने साधारण अंग्रेजी स्कूल में सामान्य शिक्षा प्राप्त की और आजीविका के लिए रेलवे में क्लर्क की नौकरी कर ली |पंडित जी की पत्नी बहुत कर्कश स्वभाव की थी फिर भी उन्होंने कभी भी अपने जीवन की इस कडुवाहट को सार्वजानिक व्यवहार में नहीं आने दिया |पंडित जी के जीवन का पूर्वार्ध भटकाव से भरा और प्रायः निरर्थक रहा |एक दिन किसी विद्वान के शास्त्र प्रवचन सुनकर उनके मन पर इसका बड़ा सकारात्मक प्रभाव पड़ा जिसने उनके जीवन की दिशा ही बदल दी |मानो उनके भीतर छिपी प्रतिभा को प्रस्फुटन के लिए अनुकूल आधार-भूमि मिल गयी |इसके पश्चात् श्रुताभ्यास में निरंतर संलग्न होकर उन्होंने दिगंबर जैन परंपरा के शास्त्रों का गंभीर अध्ययन ,मनन किया और उनमें निपुणता प्राप्त करते हुए संस्कृत और प्राकृत भाषाओँ पर पूर्ण अधिकार प्राप्त कर लिया |आर्ष ग्रंथों की सहायता से उन्होंने जैन सिद्धांत ,तत्वज्ञान ,दर्शन और न्याय को हस्तामलकवत कर लिया |
                    जैन दर्शन के ध्वजवाहक बनकर आपने यत्र-तत्र अनेक जैन पत्र-पत्रिकाओं का संपादन किया |जिनमें दिगंबर जैन महासभा मुंबई का प्रकाशन 'जैन-मित्र' विशेष है |पंडित जी के संपादकत्व में जैनमित्र ने अखिल जैन समाज का पहरुआ बनकर न केवल उसे एक सूत्र में पिरोने का काम किया बल्कि उसकी अस्मिता को एक नई पहचान दी |आपने कई सफल शास्त्रार्थ किये और अपनी वाग्मिता से अजैनों को भी मुग्ध कर दिया |उन्होंने अपनी विलक्षण मेधा से जैन न्याय और सिद्धांत की दुन्दुभी बजाते हुए जैन दर्शन की विमल कीर्ति पताका को फहराया और शैक्षिक क्रांति के अग्रदूत बने |
                       मुरैना का जैन सिद्धांत संस्कृत महाविद्यालय आपकी कीर्ति का मुख्य स्तम्भ है |यह कहना अतिशयोक्ति न होगी कि आज भारतवर्ष में जितने भी जैन विद्वान् हैं उनमें से अधिकांश पंडित जी की शिष्य -प्रशिष्य परंपरा में हैं |
                       समाज सेवा और शिक्षण कार्य में अत्यधिक व्यस्त रहते हुए भी वे अवकाश के क्षणों में चिंतन-मनन करते रहते थे जो 'जैन सिद्धांत दर्पण' सुशीला उपन्यास और जैन सिद्धांत प्रवेशिका के प्रणयन के रूप में हमारे सामने है |इनमें से बहुप्रसारित जैन सिद्धांत प्रवेशिका जैन धर्म और दर्शन के विद्यार्थियों के लिए बहुत उपयोगी है ,जो एक पारिभाषिक कोष का काम देती है|| 

शुक्रवार, 13 जनवरी 2012

चुनावी बीन


बीन बजी ,फिर खुला पिटारा
देखें,किसके हैं पौ -बारह /
किसने खायी दूध-मलाई
दिन दूनी और रात चौगुनी ,
किसने करी कमाई भाई /
किसने पहनी हैं मालाएं नोटों की ,
किसके चर्चे हैं
किसने स्टेचू बनवाकर ,
जनता के पैसे खर्चे हैं /
भरमा रहा कौन जनता को ,
कौन कर रहा झूठे वादे
आस्तीन में सांप छिपाए
किसके हैं खूंख्वार इरादे /
कौन मजहवी जहर घोल कर
चाहे उल्लू सीधा करना ,
महज चुनावी वैतरणी को
चाहे इनसे पार उतरना /
कौन देश का हितचिन्तक है
हर दल ,प्रत्याशी को तौलें ,
कौन तुम्हारा दुःखभंजक है
एक-एक कर सभी टटोलें /
आखिर कुछ मुद्दों का तो हो ,
उचित तरीके से निपटारा
बीन बजी,फिर खुला पिटारा /
देखें किसके हैं पौ-बारह//
       श्रीश राकेश