बुधवार, 23 नवंबर 2022

स्वयमेव मृगेन्द्रता:डाॅक्टर गोविन्द सिंह


 नाभिषेको न संस्कारः सिंहस्य क्रियते वने।
विक्रमार्जितसत्वस्य स्वयमेव मृगेन्द्रता ॥

(वनराज सिंह का कोई राज्याभिषेक नहीं करता बल्कि वह स्वयंभू राजा होता है। अपने पौरुष और सामर्थ्य के बल पर वह वन क्षेत्र का अधिपति होता है। अपने गुणों और पराक्रम द्वारा मृगेंद्र पद पर आसीन होने को ही हितोपदेश के रचनाकार नारायण पंडित ने 'स्वमेव मृगेन्द्रता' कहा है।)

मध्यप्रदेश का भिंड,जो भिंडी नामक पौराणिक ऋषि की तपोभूमि रहा है और कालांतर में उन्हीं के नाम पर इतिहास में प्रख्यात हुआ, वीरों की भूमि रहा है। अध्यात्म और बलिदान की इस भूमि का अतीत काफी गौरवशाली रहा है। देशभक्ति और आत्माभिमान यहां के लोगों में कूट कूटकर भरा है। यहां की उर्वरा भूमि ने प्रदेश को अनेक जननायक दिए हैं, जिनमें से एक उल्लेखनीय नाम डाॅक्टर गोविन्द सिंह का है जिन्होंने वर्ष 1990 से लगातार सात बार लहार विधानसभा क्षेत्र से विधायक के रूप में निर्वाचित होकर कीर्तिमान स्थापित किया है।एक समय लहार क्षेत्र के विधायक के रूप में डाॅक्टर गोविन्द सिंह को जानने वाले प्रदेश के लोग अब लहार क्षेत्र को डाॅक्टर गोविन्द सिंह के नाम से जानते और पहचानते हैं।यह सच में बहुत असाधारण बात है।श्री नरसिंहराव दीक्षित के बाद डाॅक्टर गोविन्द सिंह ऐसे इकलौते नेता हैं जिनकी समूचे भिंड क्षेत्र में तूती बोलती है।
    राजनीति में पदार्पण के साथ ही डाॅक्टर गोविन्द सिंह ने समाज के हाशिए पर धकेले गए लोगों के हितों की रक्षा के लिए अपने संकल्पित राजनीतिक महाभियान की शुरुआत की और उसे अपनी परिणति तक पहुंचाने में प्राणपण से जुट गए। दलितों और वंचितों की आवाज बनकर राजनीतिक गलियारों में मुखर रहने वाले डॉक्टर सिंह ने भिंड और लहार क्षेत्र से जुड़े मुद्दों को लेकर होने वाले राजनीतिक संघर्ष में हमेशा अपनी अग्रणी भूमिका निभाते हुए उनका न्यायपूर्ण ढंग से साथ दिया है और अपने जनप्रतिनिधि होने के दायित्व का सही अर्थों में निर्वाह किया है। दलित, पीड़ित और वंचित लोगों के साथ हमेशा खड़े रहने वाले डॉक्टर सिंह ने सार्वजनिक जीवन में भी उच्च नैतिक प्रतिमान स्थापित किए हैं। दलितों और वंचितों के प्रति उनकी पक्षधरता दीवानगी की हद तक रही है।
        क्षेत्र की जनता के साथ सीधा जुड़ाव, लोगों की दिन -प्रतिदिन की समस्याओं के समाधान में व्यक्तिगत पहल,सबका साथ-सबका विकास डाॅक्टर साहब की कार्यशैली रही है।डाॅक्टर साहब की सहज सुलभता और क्षेत्र की जनता से व्यक्तिगत जुड़ाव ने उन्हें सबका चहेता बना दिया है।
         डाॅक्टर साहब की सांगठनिक क्षमता विलक्षण है। कांग्रेस पार्टी से जुड़ने के बाद डॉक्टर साहब ने सबसे पहले दशकों से गुमनामी के अंधेरे में गुम कांग्रेस पार्टी की स्थानीय इकाई को पुनर्गठित कर उसमें नया जोश भरा और स्थानीय समस्याओं को लेकर छेड़े गए राजनीतिक संघर्षों के द्वारा कांग्रेस की लहार इकाई को अपने पैरों पर मजबूती से खड़ा कर उसे पुनर्स्थापित किया।डाॅक्टर साहब की संगठन क्षमता का लोहा उनके राजनीतिक विरोधी भी मानते हैं।
      लहार क्षेत्र में विकास की भागीरथी बहाने वाले  विकास-पुरुष डाॅक्टर सिंह की पहल और प्रेरणा से अब तक 327.5 करोड़ रुपए के रिकार्ड विकास कार्य हुए हैं जो एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है और जिसने लहार क्षेत्र के विकास में एक नया आयाम जोड़ दिया है।
           डाॅक्टर गोविन्द सिंह का जन्म भारत के हृदय प्रदेश मध्यप्रदेश के भिंड जिलान्तर्गत लहार तहसील के वैशपुरा ग्राम में 1 जुलाई 1951 में हुआ था।आप पिता श्री मथुरा सिंह कुशवाह (कछवाह)व माता श्रीमती रामप्यारी देवी के आंगन की किलकारी हैं। प्रारंभिक शिक्षा के उपरांत जीवाजी विश्वविद्यालय से बी.ए. की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद आपने शासकीय आयुर्वेदिक महाविद्यालय जबलपुर से बी.ए.एम.एस. की डिग्री प्राप्त की। छात्र जीवन से ही आपकी सामाजिक और राजनीतिक गतिविधियों में गहरी रुचि और सक्रियता रही है।आप वर्ष 1974-75 में आयुर्वेदिक महाविद्यालय जबलपुर छात्र संघ के अध्यक्ष चुने गए। छात्र राजनीति के इस प्रयोग काल में ही उनमें राजनीतिक नेतृत्व कौशल का बीजारोपण हुआ और उनके भावी राजनीतिक जीवन का ब्लूप्रिंट तैयार हुआ जो जमीनी राजनीति से जुड़ने पर उनके सोशल इंजीनियरिंग के व्यावहारिक प्रयोगों में प्रस्फुटित हुआ।
            आप वर्ष 1979-82 एवं वर्ष 1984-85 में सहकारी विपणन संस्था लहार के अध्यक्ष रहे व वर्ष 1984-86 में जिला सहकारी भूमि विकास बैंक के अध्यक्ष पद पर आसीन रहे। वर्ष 1990 में पहली बार मध्यप्रदेश की 9वीं विधानसभा के सदस्य निर्वाचित हुए और तब से लगातार रिकॉर्ड सात बार चुनकर 15वीं विधानसभा में लहार क्षेत्र का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं।आपके नाम दर्जनों उपलब्धियां दर्ज हैं। वर्ष 1997 में उत्कृष्ट विधायक सम्मान से सम्मानित हुए। वर्ष 1998-2003 में गृह राज्य मंत्री व सहकारिता विभाग के केबिनेट मंत्री रहे तथा वर्ष 2019 में कमलनाथ मंत्रिमंडल में सामान्य प्रशासन, सहकारिता, खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति, उपभोक्ता संरक्षण विभाग व संसदीय कार्य विभाग के केबिनेट मंत्री रहे हैं। वर्ष 2002 में मध्य प्रदेश राज्य सहकारी आवास संघ व वर्ष 2009-12 में मध्यप्रदेश लोकलेखा समिति के अध्यक्ष पद पर आसीन रहे हैं। वर्ष 2016 व 2017 में प्रतिष्ठित नई दुनिया संसदीय पुरस्कार म.प्र. से सम्मानित हुए। वर्ष 2008 से अब तक लगातार मध्यप्रदेश कांग्रेस कमेटी के उपाध्यक्ष हैं व 29 अप्रैल 2022 से नेता प्रतिपक्ष की आसंदी पर विराजमान हैं। राजकीय प्रतिनिधि मंडल के सदस्य के रूप में आप अनेक बार विदेश यात्रा कर अपने अनुभव के अक्षयकोष को समृद्ध कर चुके हैं।

          प्रकृति और पर्यावरण के प्रति आपके मन में उत्कट प्रेम रहा है। बीहड़ में स्थित नारदेश्वर क्षेत्र को पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने में आपने पहल की और बीहड़ को सुरम्य और दर्शनीय स्थल में परिवर्तित कर दिया। भिंड क्षेत्र में अवैध और अविवेकपूर्ण रेत उत्खनन से हो रही पर्यावरणीय क्षति के बारे में जनजागरण करने के लिए और शासन -प्रशासन को कुंभकर्णी नींद से जगाने के लिए आपने पदयात्राएं की और आंदोलनों का नेतृत्व किया।

डाॅक्टर साहब ने लहार क्षेत्र में विकास की जो नई इबारत लिखी है उससे इस क्षेत्र को एक नई पहचान मिली है। लहार विधानसभा क्षेत्र मध्यप्रदेश का ऐसा इकलौता विधानसभा क्षेत्र है जिसका प्रत्येक ग्राम और उपग्राम पक्की सड़क द्वारा मुख्यमार्ग से जुड़ा है।अतीत में अशिक्षा और अपराध के गहरे अंधेरे में डूबे इस क्षेत्र में शिक्षा का जो नया आलोक फैला, उसके कारण यहां के सैकड़ों युवा आज उच्च तकनीकी और प्रशासनिक पदों पर पदस्थ हैं और विदेशों में भी कार्यरत हैं। लेकिन 2023 की चुनावी सूनामी में उन्हें करारी हार का सामना करना पड़ा।


शुक्रवार, 14 अक्टूबर 2022

डिजिटल साया और बच्चे

 कहते हैं कि लोगों को उनकी संगति से पहचाना जाता है क्योंकि हम जो कुछ जानते हैं वह या तो अपने अनुभव से सीखते-जानते हैं या दूसरों से मिली जानकारी से। हमारी जानकारी का बहुलांश  स्वानुभव के बजाय अर्जित अधिक होता है। मातापिता, गुरुजन, मित्र और पुस्तकें हमारे ज्ञानार्जन के सामान्य स्रोत है। लेकिन अब डिजिटल माध्यम इसमें बहुत बड़ी भूमिका निभाने लगे हैं। मोबाइल की सर्वसुलभता ने इसके प्रभाव की व्यापकता को और बढ़ा दिया है। जैसे ब्लेड का इस्तेमाल हजामत करने के लिए होता है लेकिन उसका दुरुपयोग जेब काटने के लिए भी किया जाता है।उसी तरह मोबाइल के जरिए सकारात्मक जानकारी भी पलक झपकते जुटाई जा सकती है वैसे ही नकारात्मक और वर्जनीय जानकारी जुटाई जा सकती है।सेक्स और पोर्न जैसे विषयों, जिनमें वयस्कों की दिलचस्पी होती है,वे अब कच्ची उम्र के बच्चों के लिए भी सहज सुलभ हैं। जैसे बंदर के हाथ में उस्तरा देना सुरक्षित नहीं होता वैसे ही  बच्चों को हासिल यह अवांछित जानकारी उन्हें उम्र से पहले वयस्क बना देती और उसके जो दुष्परिणाम होते हैं उसे बताने की जरूरत नहीं है। फेसबुक जैसा लोकप्रिय डिजिटल माध्यम चाहे-अनचाहे अश्लील सामग्री परोसता रहता है।कालगर्ल फेसबुक वाच के जरिए उत्तेजक विजुअल डालकर लोगों को उकसाती हैं।यह बड़ी चिंताजनक स्थिति है। चूंकि पढ़ाई-लिखाई एक जरूरी टूल होने की वजह से मोबाइल आज हर किशोर के पास है इसलिए उनमें यह विवेक और समझ पैदा करने की जरूरत है कि उनके लिए क्या हितकर और जरूरी है और कौन से विषय अवांछनीय हैं। गर्लफ्रेंड और बायफ्रेंड बनाना न केवल फैशन है बल्कि स्टेटस सिंबल बन रहा है। इसलिए आपकी जरा-सी लापरवाही आपके बच्चों को अंधेरे गर्त में धकेल सकती है। गूगल का सर्च इंजन काफी हद तक अश्लील सामग्री को फिल्टर करता है लेकिन यूसी ब्राउज़र, ओपेरा ब्राउज़र इस तरह की वर्जनीय सामग्री को सर्च करने में मददगार बनता है। इसलिए केवल गूगल क्रोम जैसे ब्राउजर को वरीयता दें। बच्चों पर अपनी पैनी नजर रखें। वे आपको ब्लफ तो नहीं दे रहे हैं इस बात को लेकर सतर्क रहें।🤔

सोमवार, 30 जुलाई 2018

वेदों की मूल अंतर्दृष्टि

ऋग्वेद की अंतर्वस्तु का अध्ययन और पड़ताल करने पर वैदिक जनों के मूल याने आद्यभौतिकवादी दृष्टिकोण पर पर्याप्त प्रकाश पड़ता है |अधिकांश ऋचाओं में लौकिक कामनाओं को केन्द्रीय महत्त्व मिला है |उनमें या तो वैदिक जनों की लौकिक आवश्यकताओं की पूर्ती के लिए की जाने वाली आनुष्ठानिक क्रियाओं का उल्लेख है या उन अवसरों पर गाये जाने वाले गानों का वर्णन है जिनकी विषयवस्तु उनकी प्रत्यक्ष आवश्यकताएं और भौतिक इच्छाएं हैं |चूँकि विचार मूलतः व्यवहार का उत्पाद है और जीवन की वास्तविक परिस्थितियां प्रत्येक युग में चिंतन की दिशा और दशा दोनों का निर्धारण और नियमन करती है इसलिए ऋग्वेद में परिलक्षित दृष्टिकोण वैदिक जनों की मूल विचारदृष्टि मालूम होती है ,जो स्पष्टतः आद्यभौतिकवादी दृष्टिकोण है |कालांतर में जीवन की परिस्थितियों में बदलाव आने पर वर्गीकृत समाज में स्वभावतः भाववादी दृष्टिकोण अधिक ग्राह्य माना गया जिसके कारण वैदिक जनों के सामूहिक जीवन में मौजूद आद्यभौतिकवादी दृष्टिकोण को भाववादी रहस्यात्मकता ने अतिच्छादित कर लिया और व्राह्मण काल आते -आते वह गौण होकर तिरोहित हो गया |

कर्म : जैन दृष्टि में

जैन मान्यता है कि मन ,वाणी और कर्म से की जाने वाली हर क्रिया से एक सूक्ष्म प्रभाव उत्पन्न होता है जिसकी'कर्म' संज्ञा है और इसका भौतिक अस्तित्व माना गया है लेकिन अत्यंत सूक्ष्म होने के कारण यह इन्द्रियगोचर नहीं होता |न दिखने के कारण इसे 'अदृष्ट 'की संज्ञा भी दी गयी है |जिस प्रकार क्रिया (व्यापार)'कर्म 'का आधार है ,उसी प्रकार 'कर्म' भी क्रिया का आधार है |'क्रिया' और 'कर्म' का यह चक्र अनवरत चलता रहता है |क्रिया और कर्म के बीच वीज -वृक्षवत सम्बन्ध माना गया है क्योंकि जिस प्रकार वीज से वृक्ष और वृक्ष से वीज उत्पन्न होते हैं उसी प्रकार 'क्रिया' से 'कर्म' नामक यह सूक्ष्म अदृश्य तत्व उत्पन्न होता है और यह 'कर्म' किसी अन्य 'क्रिया' का हेतु बनता है तथा जिस प्रकार वीज अनुकूल परिस्थितियों में अंकुरित होता है उसी प्रकार कर्म भी अनुकूल समय पर फलित होते हैं और क्रिया और तत्जनित सुख दुःख का हेतु बनते हैं |चूँकि वीज को भून देने से उसकी उत्पादकता नष्ट हो जाती है इसलिए 'कर्म' और वीज की इस समानता के आधार पर तपस्या द्वारा ,जिसका मूल अर्थ तपना या उष्णता के प्रति सहनशीलता विकसित करने के लिए किया जाने वाला अनुष्ठान है -से कर्म निष्फल और प्रभावहीन हो जाते हैं जिससे क्रिया और कर्म के इस चक्र का उच्छेद हो जाता है |क्रिया से कर्म और कर्म से क्रिया और सुख -दुःख के वेदन के चक्र का उच्छेद करने के लिए क्रिया से विरति को एकमात्र उपाय समझने के कारण जैन परंपरा में 'अक्रियावाद' का पुरस्करण देखने को मिलता है |निवृत्ति के अपने आत्यंतिक आग्रह के कारण जैन दृष्टि एक श्रमापसारी विचार- दृष्टि बन गयी है |

दर्शन का दिग्दर्शन

दर्शन या दर्शनशास्त्र से सामान्य तात्पर्य है -जीवन और जगत के मूल उत्स के बारे में सैद्धांतिक विमर्श | इस विमर्श में जीवन को उन्नत बनाने के उपाय खोजना भी शामिल है लेकिन प्रायः हमारा आग्रह जीवन के भौतिक पक्ष पर कम और उसके अपार्थिव और लोकोत्तर पक्ष पर ज्यादा रहा है |इस कारण दर्शनशास्त्र वास्तविक जीवन की समस्याओं का अध्ययन न कर काल्पनिक और अगोचर संसार के अध्ययन की ओर उन्मुख रहा है जो उचित नहीं है |दर्शन का मूल या बुनियादी प्रश्न यह है कि पदार्थ और चेतना में से प्राथमिक या मूल तत्व कौन-सा है ,जिससे जीवन का उद्भव हुआ या ये दोनों ही चरम वास्तविकताएं हैं जो जीवन के आधार घटक या उपादान हैं |जब हम पदार्थ और चेतना ,दोनों की चरम वास्तविकता होने की सम्भावना पर विचार करते हैं तो सहज ही यह प्रश्न उपस्थित होता है कि यदि पदार्थ और चेतना दोनों के संयोग से जीवन का उद्भव हुआ है और दोनों ही चरम वास्तविकताएं हैं तो इनको सार्वकालिक और सार्वत्रिक होना चाहिए और ये दोनों तत्व निखिल ब्रह्माण्ड में व्याप्त होने चाहिए लेकिन हमारे सौर मंडल में पृथ्वी के अतिरिक्त अन्य किसी भी ग्रह पर जीवन के अस्तित्व के प्राथमिक चिन्ह बहुत खोजने पर भी नहीं मिले हैं |इसके आलावा पृथ्वी पर भी जीवन की उपस्थिति और बहुलता सर्वत्र नहीं है ,जबकि पदार्थ तो इस पृथ्वी और निखिल ब्रह्माण्ड में सर्वत्र मौजूद है |तब क्या यह मानना चाहिए कि चेतन तत्व सर्वत्र व्याप्त नहीं है लेकिन ऐसा मानने पर उसकी चरम वास्तविकता वाली स्थिति खतरे में पड़ जाती है |यदि यह माने कि दोनों तत्व ब्रह्माण्ड में सर्वत्र विद्यमान हैं पर उनका संयोग किसी 'उत्प्रेरक 'की उपस्थिति में संभव होता है तो उस उत्प्रेरक को भी सर्वव्यापक होना चाहिए और यदि यह सम्भावना सत्य होती तो इस ब्रह्माण्ड में सर्वत्र या कम से कम निकट के किसी अन्य ग्रह ,उपग्रह पर जीवन के चिन्ह मिलने चाहिए थे लेकिन ऐसा भी नहीं है ,इसलिए इस सम्भावना को पूरी तरह खारिज करते हुए जब हम पदार्थ या चेतना में से किसी एक तत्व के प्राथमिक होने की अद्वैतवादी संकल्पना पर विचार करते हैं तो पाते हैं कि यदि चेतन तत्व से पदार्थ का विकास हुआ होता तो जहाँ पदार्थ है वहां जीवन भी अवश्य होना चाहिए लेकिन ऐसा नहीं है |इसलिए यह सम्भावना ही युक्तियुक्त लगती है कि पदार्थ के विकास की उच्चतर अवस्था में 'चेतना' नामक यह गुण विकसित या उत्पन्न हुआ है और इसीलिए चेतना की प्रखरता पदार्थ के विकास की उच्चतर अवस्था और उसकी जटिलता के परिमाण पर निर्भर करती है|यह निष्कर्ष ही भूतवाद की आधार भूमि है और इसके विपरीत जो चेतना को प्राथमिक मानते हैं ,वे भाववादी हैं ,जो यथार्थ की ओर से आँखें मूंदकर कल्पना- विलास में निमग्न रहते हैं |
श्रीश राकेश

यथार्थ- एक टिप्पणी

यथार्थ कृत्यात्मकता में निहित होता है |इसलिए उसे केवल क्रियात्मक रूप से जाना जा सकता है |हर वह तथ्य जो क्रियमाण या प्रवृत्तमान है ,यथार्थ है |यथार्थ का प्रकटीकरण गति या प्रवृत्ति के द्वारा होता है ,इसलिए गति या प्रवृत्ति यथार्थ के रूपाकार हैं |जो घटित हो रहा है ,वह यथार्थ है और जिसके घटित होने की संभाव्यता है ,वह संभावना है |यथार्थ अस्तित्वभूत होता है ,उसका अवबोधन इन्द्रियों के माध्यम से संभव है लेकिन संभावना परोक्ष और अनगढ़ होती है |यथार्थ एक साकार संभावना होती है जबकि संभावना एक गर्भित यथार्थ होता है ,जिसके अवतरण का न तो समय निशित होता है और न स्वयं अवतरण |
यथार्थ वह है जो अपने विद्यमान रूप में है और आदर्श वह है जो देश, काल और परिस्थिति के अनुसार वांछनीय और उचित है |इसलिए आदर्श हमेशा श्रेयस्कर होते हैं |कहना न होगा कि हमारा बल आदर्श के यथार्थीकरण पर होना चाहिए |
.....श्रीश राकेश

यज्ञ- एक टिप्पणी

यज्ञ को श्रीपाद अमृत डांगे वैदिक जनों के उत्पादन का सामूहिक ढंग मानते हैं जबकि देवीप्रसाद चट्टोपाध्याय इसे सामूहिक उत्पादन का आनुष्ठानिक पक्ष मानना चाहते हैं लेकिन मेरे विचारानुसार यज्ञ वितरण का सामूहिक ढंग है |वर्गपूर्व समाज में कबीले के हर सदस्य द्वारा किये गए उपार्जन को कबीले की संपत्ति माना जाता था तथा व्यक्तिगत संपत्ति का कोई अस्तित्व नहीं था और कबीले की एकमात्र संपत्ति निर्वाह- द्रव्य या खाद्य पदार्थ हुआ करती थी |यज्ञ, कबीले के श्रम- सक्षम सदस्यों द्वारा किये गए उपार्जनों का कबीले के सभी सदस्यों में यथायोग्य वितरण का एक सामूहिक ढंग है और संभवतः इस अवसर पर होने वाला कोई अनुष्ठान या कर्मकांड भी |यज्ञ के निमित्त आने वाली सामग्री को 'साकल्य' कहने के पीछे भी यही भाव-व्यंजना मालूम होती है|
...........श्रीश राकेश

अनेकांत- एक टिप्पणी

हर वस्तु अपनी संरचना में जटिल और संश्लिष्ट होती है क्योंकि उसके अनेक पक्ष और आयाम होते हैं |चूँकि हमारी दृष्टि और भाषा दोनों की एक सीमा है इसलिए एक समय में हम किसी वस्तु का एक ही आयाम या पक्ष ग्रहण कर पाते हैं क्योंकि जब हम उसका एक आयाम पकड़ते हैं तो दूसरा छूट जाता है और दूसरा पकड़ने पर पहला छिटक जाता है ,फलतः उसे समग्र रूप से एक साथ एक समय में ग्रहण कर पाना संभव नहीं होता |इसलिए एक आयाम या पक्ष पर आधारित अर्थ-निरूपण हमेशा अपूर्ण और एकांगी होता है |यह एकांगी निरूपण ही एकांत कहलाता है क्योंकि किसी वस्तु का उसके द्रष्टा ने जो पक्ष देखा या जाना होता है उसी का वह निरूपण करता है जो प्रायः भिन्न-भिन्न होता है और उस वस्तु के खंडित स्वरूप का निदर्शन कराता है |यह एकांत निरूपण ही विरोधों को जन्म देता है जो अनेक विग्रहों का कारण बनता है |इसीलिए विरोधों का शमन करने और वस्तु स्वरूप के सम्यक निदर्शन के लिए जैन मनीषियों ने अनेकांत का प्ररूपण किया |अनेकांत की अवधारणा समग्रता की अवधारणा है जो असीम सत्य के सीमित व सापेक्ष दृष्टि से किये गए निरूपणों के संश्लेषण का तार्किक फलन है ||

सोमवार, 28 जुलाई 2014

वैवाहिक बुढ़िया पुराण

विवाह एक महत्वपूर्ण सामाजिक संस्था है जिसका उद्देश्य व्यक्ति को जैविक और सामाजिक पूर्णता प्रदान कर समाज की निरंतरता बनाये रखने के मान्यविधान को गतिशील रखना है |विभिन्न भाषाओं  ,संस्कृति और जातीय वैशिष्ट्य के आधार पर विवाह के अनेक स्वरूप और रीतियाँ प्रचलित हैं लेकिन इन सभी का यहाँ विवेचन करना हमारा अभीष्ट न होकर हिंदी भाषी क्षेत्र के हिन्दुओं में विवाह के समय होने वाले लोकाचारों की प्रासंगिकता को रेखांकित कर उनके औचित्य को परखना और विमर्श करना है |
                  विवाह के अनुष्ठान का वर और कन्या की कुंडली मिलान के साथ श्रीगणेश होता है |भावी दम्पति का जीवन सुखमय और निर्विघ्न हो इसलिए ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुरूप वर और कन्या की कुंडली मिलाई जाती  है |लेकिन अनेक बार वर और कन्या में ज्योतिषीय अनुरूपताओं के बावजूद उनका वैवाहिक जीवन असंतोषपूर्ण और असफल होता है अथवा निर्दोष विवाह मुहूर्त होने पर भी प्राकृतिक या मानवीय बाधाएँ उपस्थित हो जाती  हैं |इसके विपरीत ऐसे अनेक उदाहरण  हैं जिनमें विना कुंडली मिलाये या विना शुभ मुहूर्त के संपन्न हुए विवाह पूर्ण सफल रहे हैं और उनके बीच तालमेल की कोई कठिनाई नहीं आई |बहरहाल  सुखी और सफल दाम्पत्य जीवन के लिए ज्योतिषीय अनुरुपताओं की निर्णायकता और प्रभावकारिता वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित नहीं है |लेकिन यदि विवाह निश्चित करते समय विवाहर्थियों के स्वास्थ्य सम्बन्धी पहलुओं को दृष्टिगत रखा जाये तो यह भावी दम्पति के लिए अवश्य लाभप्रद होगा |
                  वर पक्ष और कन्या पक्ष दोनों के संतुष्ट और सहमत होने पर विवाह का पहला चरण पूरा होता है और दूसरे सोपान के रूप में लग्नोत्सव का कार्यक्रम होता है जिसमें कन्या पक्ष द्वारा लग्न पत्रिका वर पक्ष को प्रेषित की जाती है |इसमें वैवाहिक अनुष्ठान का पूरा समयबद्ध विवरण समाहित रहता है और जो इस अनुष्ठान के शुभारम्भ की औपचारिक घोषणा भी होती है |
                  पुराने समय में जब न मशीनी आटा चक्की थी और न गैस से संचालित होने वाले चूल्हे थे ,एक बड़े समूह के लिए भोजन का प्रबंध करना निश्चय ही एक कठिन और चुनौती भरा कार्य था |इसलिए सहकार के आधार पर इस चुनौती से निपटा जाता था |चूँकि खाना बनाने के वास्ते बड़े-बड़े चूल्हे बनाने के लिए काफी मात्रा में मिट्टी की आवश्यकता होती थी इसलिए विवाहार्थी पक्ष और उनकी सम्बन्धी व मित्र महिलाएं इस कार्य हेतु मिट्टी लाने के लिए गाँव के किसी उपयुक्त स्थान पर सामूहिक रूप से जाती थीं और गाते-बजाते हुए समारोहपूर्वक इस कार्य को संपन्न करती थीं ,जो 'मटियाने की रस्म' कहलाती है |इसी प्रकार आटा पीसने का कार्य भी सहकार के आधार पर होता था, जिसमें सभी सम्बन्धी और मित्र महिलाएं हाथ बाँटती और श्रम-परिहार के लिए मंगलगीत गाते हुए इस चुनौती भरे कार्य को पूरा करती थीं |चूँकि यह एक समयसाध्य कार्य था इसलिए विवाहार्थी पक्ष द्वारा आगंतुक महिलाओं के लिए स्वल्पाहार की व्यवस्था की जाती थी जो चबैना कहलाता था और जो सामान्यतः अंकुरित चना (बिल्हा) होता था |भले ही आज यह सारा कार्य बिजली से चलने वाले उपकरणों की मदद से सहजता से हो जाता है  लेकिन सहकार की वह दुर्लभ सामाजिक भावना लुप्त होती जा रही  है,जो हमारी सबसे बड़ी विशिष्टता रही है |आज इन रस्मों को उनके औचित्य और उपयोगिता को समझे विना  महज लकीर पीटने के लिए ही निभाया जाता है |
               हल्दी और मेहंदी की रस्मों का उद्देश्य  वर और कन्या के रूप-सौन्दर्य को निखारना और उनके व्यक्तित्व में चार चाँद लगाना है |ये महज रस्में नहीं हैं बल्कि इन्हें निभाते समय जो प्यार और अपनापन छलकता है ,वह अतुलनीय है |आज पेशेवर सौन्दर्य-विशेषज्ञ इस कार्य के लिए बुलाये जाते हैं लेकिन उसमें भावनाओं की वह अनूठी मिठास कहाँ होती है ?
             वर और कन्या दोनों पक्षों में मंडप-आच्छादन का कार्यक्रम होता है |मंडप वह निर्दिष्ट स्थान होता है जहाँ पर इस अनुष्ठान से जुड़ीं सभी प्रमुख रस्में पूरी की जाती हैं | इसका निर्माण में लकड़ी के चार खम्भों और आच्छादन के लिए कांस या घास-फूस का उपयोग होता है |वर पक्ष के यहाँ मंडप के मध्य में एक स्तम्भ पर दीपाधार लगा रहता है जिस पर दीपक प्रज्वलित कर रखा जाता है और जो घर में हर्षोल्लास के आगमन का प्रतीक होता है |कन्या पक्ष के यहाँ मंडप के चारों खम्भों के सहारे मिट्टी के सात-सात कलश रखे जाते हैं जो आम के पत्तों से सुसज्जित रहते हैं |जिन्हें चौरी कहते हैं ,स्थान भेद से इसके लिए अन्य नाम भी प्रचलित हो सकते हैं |मिट्टी के ये सुसज्जित कलश संपन्नता का प्रतीक होते हैं |सप्तपदी के समय जब वर-कन्या मंडप की प्रदक्षिणा करते हैं ,हल्दी में रंगा कच्चा सूत(कलावा)उसके चारों ओर लपेटा जाता है |जो कच्चे सूत की तरह नाजुक वैवाहिक रिश्ते को यत्नपूर्वक और सावधानी से सहेजने-सँभालने के गहरे अर्थ को अपने भीतर समेटे होता है |
विवाहार्थी पक्ष के सभी निकट सम्बन्धियों के कपड़ों पर हल्दी रँगे दोनों हाथों की छाप लगाई जाती है |यह  एक पहचान-चिन्ह है जो विवाहार्थी पक्ष से उनकी निकटता दर्शाता है |पाणिग्रहण के दिन एक महत्वपूर्ण रस्म वर-कन्या के मामा पक्ष द्वारा पूरी की जाती है जो भात,चीकट या पहरावनी के नाम से जानी जाती है ,जिसमें भाई(भतैया)अपनी बहिन (यथास्थिति ,वर या कन्या की माँ )को भात(चावल)भेंट करता है ,जिसे खाकर वह अपना उपवास तोड़ती है |इस अवसर पर भतैया अपनी बहिन,बहनोई और उनके परिजनों को यथाशक्ति वस्त्र-आभूषण भेंट करता है जो इस पावन कार्य के संपादन में उनके सहयोग का विवक्षित आश्वासन होता है |
                 पाणिग्रहण के समय वर पक्ष  कन्या(दुल्हन)के श्रृंगार के निमित्त जो सौभाग्य -सामग्री ले जाता है उसमें लकड़ी का बना सिंदूरदान(सिंदरोटा)प्रमुख होता है |यह सिंदरोटा ही अब सिन्दोरी-सिंदोरा कहलाने लगा है |इसी अवसर पर जल के देवता वरुण की पूजा के लिए मिट्टी के एक सुसज्जित कलश(बरौना) में सात प्रकार की सामग्री रखकर वर पक्ष ले जाता है जो बाद में नदी या तालाब में विसर्जित कर दी जाती है |बरौना की यह रस्म वैदिक देवता वरुण को  प्राचीन काल में मिलने वाले महत्व को प्रमुखता से दर्शाती है |
                  विवाह से जुड़ी एक दिलचस्प रस्म धान-बुबाई की रस्म है |जिसमें मंडप के नीचे कन्या पक्ष के किसी दम्पति द्वारा भावी दम्पति की सुख-समृद्धि की कामना , वर-वधू की प्रदक्षिणा करते हुए चारों ओर धान बिखेरकर की जाती है |यह वास्तव में एक प्रतीकात्मक तांत्रिक अनुष्ठान है |
                  पुराने समय में आवागमन के आधुनिक साधनों के आभाव में बैलगाड़ियाँ यात्रा सबसे सुलभ साधन थीं |चूँकि बैलगाड़ियों से यात्रा पूरी करने में काफी समय बीतता था इसलिए कन्या-पक्ष द्वारा वर-वधू और बारातियों(वर-यात्रियों )के लिए पाथेय(रास्ते के लिये नाश्ता ) साथ रखा जाता था |ये पाथेय सभी जगहों पर  सहजता से सुलभ बांस से बने बड़े टोकरों में रखा जाता था |आज यह समूचा परिदृश्य बदल चुका है लेकिन बांस के बने टोकरे ,पंखे इत्यादि  देने का चलन बदस्तूर जारी है |
                दूल्हा-दुल्हन शब्द बड़े ही अर्थ-गंभीर हैं जो संस्कृत के दुर्लभ शब्द से विकसित हुए हैं | दूल्हा ,दुल्हन की तलाश में कितना श्रम करना पड़ता है और कितने पापड़ बेलने पड़ते हैं ,यह तो  कोई भुक्तभोगी ही जान सकता है | बड़े संघर्षों के बाद कहीं हाथ पीले हो पाते है |दुल्हे का दुल्हन के घर हथियारों से सज्जित होकर घोड़े पर चढ़कर चढ़ाई करना यही तो दर्शाता है |

सोमवार, 24 फ़रवरी 2014

ऐसी दिलदारी प्रणम्य है



दौलतमंद लोग दिलदार भी हों ऐसा कतई जरुरी नहीं है ,लेकिन असली दौलतमंद वही होते हैं जिनके पास दिल की दौलत होती है |क्योंकि दौलत तो तिकड़म करके भी हासिल हो सकती है लेकिन दिलदारी संस्कारों से ही मिलती है |दौलत यों तो हरेक की चाहत और जरुरत है लेकिन दौलतमंदों में दौलत की ख्वाहिश कुछ ज्यादा ही होती है और उनकी यह चाहत 'मर्ज बढ़ता गया ,ज्यों-ज्यों दवा की ' की तर्ज पर बढ़ती ही जाती है |और मौका जब बेटे के विवाह का हो तब तो उनके अरमान ही मचल उठते हैं |वे अपने बेटे के जन्म ,लालन-पालन ,पढाई-लिखाई और शादी पर होने वाले प्रत्याशित खर्च की पूरी भरपाई करने को छटपटा उठते हैं | उनका ज़ोर होने वाली वधू से ज्यादा मिलने वाले दहेज़ पर होता है |उनके लिए वधू के मामले में तो उन्नीस-बीस चल सकता है लेकिन दहेज़ के मामले में कतई नहीं |मानो विवाह का मकसद  वधू  लाना  न होकर ,दहेज़ हासिल करना रह गया हो  |
                     लेकिन कुछ लोग ऐसे भी होते है जो इन सब बातों को झुठलाते हुए सुखद उदाहरण प्रस्तुत करते हैं |मेरे एक अधिवक्ता मित्र की पुत्री का विवाह एक हाई-प्रोफाइल एन.आर.आई. के साथ हुआ है |इस विवाह  पर अविश्विसनीय रूप से मात्र एक लाख रूपये व्यय हुए |अमेरिका में शिक्षित उनका दामाद नाईजीरिया में सॉफ्टवेयर इंजीनियर है और उसके सगे सम्बन्धी भारत में महत्वपूर्ण पदों पर पदस्थ हैं | मेरे एक अन्य पत्रकार मित्र की पुत्री का विवाह फौजी पृष्ठभूमि वाले एक हाई-प्रोफाइल कश्मीरी कौल परिवार में हुआ है |उनका दामाद भारतीय सेना में लेफ्टिनेंट कर्नल है | पूरा परिवार अत्यंत भद्र है |इस विवाह में भी अविश्वसनीय रूप से लगभग एक लाख रूपये व्यय हुए | दोनों ही प्रकरणों में दहेज़ का कोई लेनदेन नहीं हुआ | क्योंकि वर पक्ष के लोगों ने कन्या पक्ष की आर्थिक स्थिति को ध्यान में रखते हुए किसी भी प्रकार के लेनदेन से इंकार कर दिया था और सुशील,सुन्दर व सुशिक्षित वधू  पर अपना फोकस रखा | ऐसे उदाहरण विरल भले हों लेकिन रेगिस्तान में किसी मीठे पानी के चश्मे की तरह राहत  देने वाले होते हैं | ऐसी दिलदारी अनुकरणीय और प्रणम्य है |हम में से कई लोग जाने अनजाने में दहेज़ का महिमामंडन कर उसे प्रछन्न प्रोत्साहन देते हैं जो नितांत गलत है | अमीरों द्वारा किया गया वैभव-प्रदर्शन उदहारण योग्य नहीं हो सकता | उनकी तो  सिर्फ सादगी ही उदाहरण योग्य होती है |अमीरों द्वारा वैभव-प्रदर्शन तो सामान्य बात है लेकिन उनका सादगी का निर्वाह उल्लेख्य होता है क्योंकि 'महाजनो येन गतः स पन्थः' ||

मंगलवार, 18 फ़रवरी 2014

बाराती :एक व्यंग

बाराती का नाम जेहन में आते ही शरीर में सिहरन-सी दौड़ जाती है |बाराती की अपनी ही निराली शान होती है |जैसे वसंत ऋतू में युवा-बूढ़े सबकी आँखों में एक गुलाबी खुमार होता है और मन में उल्लास की नदी अपने तटों को तोड़ती बहती है वैसी ही मनोदशा एक बाराती की होती है |उसकी शान और ठाठबाट काबिलेगौर होते हैं |जनवासे की चाल का मुहावरा तो मशहूर ही है | गजगामिनी गति से चलते ,ज़माने भर की ऐंठ को अपने में समेटे बाराती को देखना एक अनूठे अनुभव से कम नहीं होता |
                                                                                          घर में बालों में कडुआ तेल मलने वाले लोग बरातों में हेयर केयर तेल की मांग करते दिखते हैं |चढ़ाई के लिए तैयार होते वक्त अपने बदन पर दोस्त के डिओ को लोग ऐसे निचोड़ते हैं कि बेचारा डिओ भी शरमा जाता है | वे मई जून की गरमी में भी कोट पहनने का मौका नहीं चूकते | भले ही  मौसम की वजह से असहज हो जायें  लेकिन फिर वे कोट पहने भी कब ? आखिर अपनी शादी के कोट का उपयोग तो करना ही है |
                                                           इन दिनों शादियों में बुफे का प्रचलन ज्यादा बढ़ रहा है | बुफे में स्टाल पर सजी मेलामाईन की प्लेटों के साथ रखे पेपर नेपकिन को लोग उठा तो लेते हैं लेकिन कहीं वह गन्दा या ख़राब न हो इसका पूरा ख्याल रखते हैं और डस्टबिन में जूठी प्लेट रखते वक्त उस पेपर नेपकिन को भी 'ज्यों की त्यों धर दीन्ही चदरिया ' की तर्ज पर उसमें डाल देते हैं |
                                                                                    'मालेमुफ्त दिले बेरहम' को सार्थक करते हुए कुछ बाराती खाली प्लेट हाथ में लेकर पहले सभी स्टालों का निरीक्षण करते हैं और फिर पसंदीदा व्यंजनों का लुत्फ़ उठाते हुए ,घूम-घूम कर बतियाते हुए या यहाँ वहाँ बैठकर किश्तों में और इत्मीनान से खाना खाने का विकल्प चुनते है | महिलायें अक्सर चाट के स्टालों के इर्दगिर्द ही  जुटीं नज़र आती हैं | इन स्टालों तक किसी अन्य का पहुँचना ,राशन की दुकान से राशन लेने से कम  दुष्कर नहीं होता | इसलिए असुविधा और मारामारी से बचने के लिए कई लोग अपनी प्लेट में एकबारगी इतना सारा खाना रख लेते हैं कि उनकी प्लेट देखकर अन्नकूट की पूजा की थाली का भ्रम होता है | ऐसे नज़रे भी देखने को मिलते हैं कि पान की गिलोरी चबाते बाराती को जब गरम दूध का कड़ाह नज़र आता है तो वह पान थूककर दूध का लुत्फ़ उठाने लगता है |छक कर  खाने के बाद जनवासे में आराम करते बारातियों के उथल-पुथल मचाते पेट से जब मीथेन और हाइड्रोजन रिलीज होती है तो वहां का मंजर वर्णनातीत होता है |

सोमवार, 28 अक्टूबर 2013

विज्ञानवेत्ता भी विज्ञानचेता बनें |

विज्ञानवेत्ता या विज्ञानविद सामान्यतः वे लोग कहलाते हैं जो विज्ञान की गहरी जानकारी रखते हैं या विज्ञान के अंतर्गत किसी विषय का विशद अनुप्रयोगात्मक ज्ञान रखते हैं |हालाँकि हर विज्ञानविद को विज्ञान की अपनी समझ को दैनंदिन व्यवहार में अपनाना चाहिए लेकिन दुर्भाग्यवश ऐसा नहीं है |जीवन-व्यवहार में हमें इसका उलट ही देखने को ही मिलता है |यह विडम्बना ही तो है कि उपग्रह प्रक्षेपण के पहले उसके निर्माता वैज्ञानिक धार्मिक अनुष्ठान संपन्न कर अपने मिशन की सफलता की कामना करते हैं |
                                                                                                                 आज फलित ज्योतिष के प्रति सामान्य जन से ज्यादा कहीं डॉक्टर और इंजिनियर आकर्षित हो रहे हैं और उसे शौकिया तौर पर या अनुषंगी व्यवसाय के रूप में अपना रहे हैं |विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में इस आशय के विज्ञापन सहज ही देखे जा सकते हैं |एक ऐसा व्यक्ति जो भौतिक विज्ञान या रसायन विज्ञान जैसे विषय में डाक्टरेट किये हो ,बिल्ली के रास्ता काटने पर यों ठिठक जाये मानो किसी ने विस्फोटक सुरंग बिछा रखी हो तो क्या उसे वैज्ञानिक चेतना संपन्न या विज्ञानचेता कहा जा सकता है ?मेरे विचार में कतई नहीं |क्योंकि विज्ञानविद होते हुए भी वह न सिर्फ अंधविश्वासों को ढो रहा है बल्कि उनका पोषण भी कर रहा है |शुभ कार्य आरंभ होने के पहले किसी के छींकने  भर से अज्ञात अनिष्ट की आशंका से लोग विचलित हो जाते हैं |किसी भी तर्क से इसे सही नहीं ठहराया जा सकता है
            विज्ञान प्रत्यक्ष को ही प्रमाण मानता है इसलिए तर्कसिद्ध ,सत्यापनीय तथ्य ही उसके लिए प्रमाण योग्य हैं |लिहाजा वह किसी भौतिकेतर सत्ता में विश्वास नहीं करता और फलतः मरणोत्तर जीवन को पूरी तरह  से नकारता है |उसका आग्रह तो काल्पनिक स्वर्ग को धरती पर ही प्रतिस्थापित करने का है |विज्ञान के मानने वालों को उसके इस सार को भी आत्मसात करना चाहिए तभी हम सही अर्थों में वैज्ञानिक चेतना संपन्न या विज्ञानचेता बन सकते हैं |
                                    अंधविश्वासों का पोषण करने वाली परम्पराओं या रुढियों को  संस्कृति के नाम पर ढोना उचित नहीं कहा जा सकता |ऐसी कालबाह्य रुढियों के नकार से संस्कृति खतरे में नहीं पड़ जाएगी और न ही हमारा गौरव धूमिल होगा |मनुष्य के लिए बेहतर संसार और समाज का निर्माण करना ही विज्ञान का एकमेव और अंतिम लक्ष्य है |कम-से-कम विज्ञान से जुड़े लोगों को तो तर्कजीवी ,परिपक्व और  वैज्ञानिक चेतना संपन्न होना चाहिए ताकि दूसरों के लिए वे उदहारण बन सकें और हमारा जीवन सुखमय और तर्कसमृद्ध बन सके ||

बुधवार, 23 अक्टूबर 2013

सपने

सपने सभी देखते हैं ,आम भी और खास भी |कुछ खुली आँखों से सपने देखते हैं और कुछ  बंद आँखों से |सपनों की अपनी दुनियां है ,सजीली और नयनाभिराम |महात्मा गाँधी ने भी एक सपना देखा था |एक ऐसे आत्मनिर्भर और शोषणमुक्त भारत का सपना ,जिसमें समाज के निचले पायदान पर खड़े अंतिम व्यक्ति को भी समान महत्व मिलेगा |जिसमें सामाजिक न्याय की प्रतिष्ठा होगी |लेकिन जो हश्र गाँधी का हुआ ,वही उनके सपने के साथ हुआ |उनका गुणानुवाद करने वाले लोगों ने ही उनके  सपने की हत्या कर दी |
                                                                                                                    आम आदमी भी सपने देखते हैं लेकिन उनके सपने उन्हीं की तरह आम होते हैं | वह सिर पर एक छत  ,दो  वक्त की रोटी की आसान जुगाड़ ,बूढी माँ का इलाज ,एक पुरानी या नई बाईसकिल खरीदने जैसे सपने देखता है |जब उनके ये सपने फलित होते हैं तो वे अपना जीवन सफल और धन्य मानते हैं और सपनों के तार-तार होने पर मानो उनकी जिंदगी बिखर जाती है |
                                खास लोगों के सपने खास होते हैं |देश में और विदेश में औद्योगिक साम्राज्य खड़ा करना ,धनकुबेर बनकर विलासिता का जीवन जीना ,किसी कमाऊ क्षेत्र में अपनी नियुक्ति का जुगाड़ ,राजनीतिक क्षत्रप बनकर राज्य सत्ता का निर्बाध सुख भोग -जैसे खास सपने उनकी आँखों में सजते हैं ,जिन्हें वे खुली आँखों से देखते हैं और उन्हें अपने जीवन में फलित करने के लिए प्राणपण से जुट जाते हैं |
                                                                                                                               आम लोग अक्सर बंद आँखों से सपने देखते हैं जबकि खास लोग खुली आँखों से सपने देखते हैं |सपने जब करवटें बदलते हैं या बिखरते हैं तो जीना मुश्किल हो जाता है |सपनो के बिखरने का  दर्द तोड़कर रख देता है |सपने हमारे जीवन में एक आश्वासन की तरह होते हैं जो भले ही झूठे हों लेकिन हमें बहुत संबल देते हैं |कुछ सपने सार्वजनिक जीवन में हलचल मचा देते हैं |इन्हीं में से एक सपना मोदी का है तो दूसरा शोभन सरकार का |इन दिनों सार्वजनिक प्रचार माध्यमों में इन सपनों को जरुरत से ज्यादा स्पेस मिल रहा है |डोंडीया खेड़ा में राजा राव रामबख्स सिंह के खजाने की बात उस इलाके के सभी बुजुर्ग लोगों को पता है |अभिलेखों में भी इस तथ्य का उल्लेख है |अंग्रेज अफसरों ने खजाने का पता लगाने के लिए राजा राव रामबख्स सिंह को कठोर यातनाएं देकर मार डाला लेकिन खजाने का पता हासिल नहीं कर सके |अनुमान है कि खजाना किले में ही कहीं दबा पड़ा है लेकिन उसके वास्तविक स्थान का पता न तो शोभन सरकार को है और न पुराविदों को |सर्वेक्षण के दौरान कोई धातु भूगर्भ में दबी होने के संकेत मिलने पर उन्होंने कुछ स्थलों को चिन्हित किया है ,जहाँ खुदाई जारी है |शोभन सरकार के सुनहले सपने पर दूसरे स्वप्नद्रष्टा मोदी जी ने सवाल उठाया और उसका मजाक उड़ाया |लेकिन जब उन्हें इस बात का अहसास हुआ कि शोभन सरकार के लाखों की संख्या में भक्त हैं और उनके सपने की सार्वजनिक तौर पर खिल्ली उड़ाने पर कहीं उनका सपना न बिखर जाये तो उन्होंने इस बात की गंभीरता को समझा और अपना दूत भेजकर उनसे क्षमा याचना की |
                                                   सपने लोगों को गुमराह भी करते हैं जैसाकि हम देख रहे हैं लेकिन ये तो खास लोगों की बात हुई |आम लोग कब खुली आँखों से सपने देखना शुरू करेंगे ??

शनिवार, 19 अक्टूबर 2013

सलूनो,भुजरिया और चांदमारी

सलूनो ,भुजरिया और चांदमारी के इस त्रिकोण का सामाजिक ,सांस्कृतिक और आर्थिक  महत्व है |सलूनो या रक्षाबंधन का महात्म्य तो सर्वविदित है |इसके आयोजन के उद्देश्य का निरूपण करने वाली अनेक लोक कथाएं प्रचलित हैं ,जिनमें पाठभेद और कथाभेद दोनों मिलता है |लेकिन कलेवर विस्तार के भय से उन सब का वर्णन करना यहाँ अभीष्ट नहीं है |पर उन सभी का सारांश यह है कि अपने प्रियजन की कुशलक्षेम की कामना से उन्हें अभिमंत्रित सूत्र बांधा जाता है ,जो रक्षासूत्र कहलाता है और जो प्रायः बहिनें अपने भाई को बांधतीं हैं |प्रतिदान में भाई भी बहिनों को यथेष्ट दक्षिणा देकर उनकी सुरक्षा का दायित्व ओढ़ता है |इस अवसर पर भुजरिया -जो जौ या गेंहू इत्यादि के नन्हे पौधे होते हैं ,का आदान-प्रदान किया जाता है और उन्हें देवी माँ को अर्पित किया जाता है और अच्छी फसल व धन-धान्य की कामना की जाती है |कुछ लोग इसे मृदा परीक्षण या बीज परीक्षण का आदिम तरीका मानते हैं लेकिन यह वास्तव में एक तांत्रिक अनुष्ठान है जो अच्छी फसल की कामना से लोक देवी को लक्षित कर किया जाता है |जिससे दैवी अनुकम्पा प्राप्त हो और प्राकृतिक प्रकोपों से फसलें संरक्षित रहें |चांदमारी का भी इस पर्व से अनोखा रिश्ता है |इसमें जलाशयों के किनारे स्थानीय लोगों द्वारा युद्ध कौशल का प्रदर्शन किया जाता है |निशानेबाजी की जाती है |चकरी मेले और अखाड़े आयोजित किये जाते हैं तथा इन सब का उद्देश्य उन जलस्रोतों पर जो  उनके पीने के पानी और फसलों की सिंचाई के प्रमुख स्रोत रहे हैं ,पर प्रतीकात्मक रूप से अपना सामूहिक आधिपत्य जतलाना होता है ताकि कोई ग्रामेतर अन्य व्यक्ति उनकी बिना अनुमति के जलाशयों के जल का उपयोग करने का दुस्साहस न कर सके |आज के परिप्रेक्ष्य में तो यह बात और भी सटीक व प्रासंगिक मालूम होती है |पानी को लेकर आये दिन तलवारें खिंचती हैं और द्वंद्व मचता है ,फिर चाहे यह मामला व्यक्तियों के बीच का हो या राज्यों के बीच का |चूँकि यह पर्व श्रावण मास में याने वर्षा ऋतू में मनाया जाता है इसलिए जल संग्रहण और उसके संरक्षण के महत्व को सहज ही समझा जा सकता है | 

शुक्रवार, 18 अक्टूबर 2013

मतदाता की जान सांसत में है !

चार राज्यों में चुनावी बिगुल बजने के साथ ही सियासी हलचलों का दौर शुरू हो गया |चुनाव जो लोकतंत्र का महापर्व है,कुछ लोगों के लिए उत्सव जैसा है |चुनाव से जुड़े कारोबारियों के चेहरे खिल गए हैं और जिन  सैंकड़ों लोगों का बिना मेहनत की रोटी का जुगाड़ हो गया है ,उनकी वाछें खिल उठी  हैं |
                                                                                                                 लेकिन हजारों लोग भी हैं जिनकी जान सांसत में है |दबंगों के इस चुनावी सिर फुटव्वल में उन्हें अपनी मुसीबत नजर आ रही है |सभी दबंगों ने अपनों पर दबाव बनाना और बढ़ाना शुरू कर दिया है |उनसे कसमें खिलाई जा रही हैं ,वादे लिए जा रहे हैं और तमामतर अहसान गिना कर उन्हें भुनाने के लिए पूरी तरह से कमर कसी जा रही है |एक-एक वोटर पर इन दबंगों की गृद्ध-दृष्टि है |उनके पास मोहल्लेबार ,वार्डबार ,और जतिबार पूरे निर्वाचन क्षेत्र की विशेष तौर पर तैयार कराई गई मतदाता सूचियाँ हैं |विरोधियों से सहानुभूति रखने वाले मतदाताओं को चिन्हित कर उन्हें घेरा जा रहा है |साम,दाम,दंड ,भेद सभी हथकंडे अपनाये जा रहे हैं |किस शख्स का कितना वजन है ,कौन कितने पैसों में बिक सकता है ,किस की रिश्तेदारी में पैठ लगाकर उन्हें काबू किया जा सकता है इसका विस्तृत आकलन तैयार किया जा रहा है |चारों ओर जासूस तैनात हैं ,जो आम लोगों की न सिर्फ नब्ज टटोल रहे हैं बल्कि उन पर पैनी नजर रखे हुए हैं और उन्हें चौबीसों घंटे सूंघकर उनका रुझान पता करने की कोशिशों में जुटे हैं |
                                                                                                                                         तो अब यह समझने में कोई कठिनाई नहीं होनी चाहिए कि आम लोगों की जान सचमुच सांसत में है |वे न खुलकर इन मुद्दों पर बात कर सकते हैं और न आपस में कोई मशविरा कर सकते हैं क्योंकि दीवारों के भी कान होते हैं |बहुत मुमकिन है कि आपके घर में ही कोई जासूस हो जो आपकी दैनंदिन गतिविधियों को नोट कर अपने आका को रिपोर्ट कर रहा हो ?इतना अविश्वास और संशय पहले कभी नहीं था |खुलकर विरोध करने या अपना पक्ष चुनने वालों को उसकी कीमत चुकानी पड़ जाती है |जिसकी भरपाई का आश्वासन वह शख्स देता है ,जिसके पक्ष में वह खड़ा होता है |लेकिन चुनाव जीतने और चुनाव बीतने के बाद भी उनकी नज़रे-इनायत ऐसी ही बनी रहेगी ,इस बात की शंका उस आश्वस्त व्यक्ति के मन में भी घर किये रहती है |किसी को जोतदारी से छुट्टी की धमकी मिलती है तो किसी को खेत की मेंड़ से न निकलने देने की गंभीर चेतावनी |मतदाता इस बात को बखूबी समझने लगा है कि चुनाव वही प्रत्याशी जीतेगा ,जिसका मेनेजमेंट बेहतर होगा |अब जन समर्थन का ज्यादा महत्व नहीं है !क्योंकि यदि  चुनाव जनआकांक्षाओं की वास्तविक अभिव्यक्ति होते तो आज हिन्दुस्तान की तस्वीर कुछ और ही होती | 

भ्रष्टाचार और चुनाव में चोली दामन का रिश्ता है !

भ्रष्टाचार बढ़ रहा यों ,ज्यों सुरसा का विस्तार |
नेताओं की  माया से  भगवान  भी  गया  हार ||
अग्निमुखी,कलियुगी देव सब चट कर जाते हैं |
बड़े  चाव  से  चारा  और  कोयला  खाते   हैं  ||
बेशर्मी  भी  इन  बेशर्मों  से  शरमाती   है   |
हिन्स्रपशु से भी निकृष्ट धनपशु की जाति है ||
चहुंमुखी प्रगति के बावजूद छाई अमावस्या है |
भ्रष्टाचार   बना है  क्योंकि  बड़ी  समस्या   है  ||
जब  चुनाव में  लाखों  रुपये  खर्च  करेंगे  लोग |
खुलकर हो  काले धन का निर्वाचन में उपयोग ||
क्यों फिर भ्रष्टाचार बने ना महाभयानक रोग |
क्योंकि जीतने पर अपनी ही जेब भरेंगे लोग ||
कम  खर्चीले  हों  चुनाव , इसलिए  जरुरी  है |
वरना  भ्रष्टाचार  यहाँ  समझो  मज़बूरी   है ||      
                                         
                                     
                                       
                                           
                                         
                                         
                                               
                                         
                                     
                                               
                                     
                                  

बुधवार, 11 सितंबर 2013

एक सवाल

चालीस-आठ  लाशों  के  ऊँचे  ढेर पर |
कुछ तो बोलो ,इस प्रायोजित अंधेर पर ||
भाजपा, सपा, बसपा  सारे  हैं  मौन   |
है  धुला  दूध  का  बोलो  इनमें  कौन ||
सेंके  सबने  इस  दावानल  में  हाथ  |
है  दिया  आततायी  लोगों  का साथ ||
सबने मिल  रौंदी  भाईचारे की छाती |
कर डाली तहस-नहस गंगा-जमुनी थाती ||
इन घड़ियाली आंसूओं का अब क्या मानी|
पहले की  आगजनी ,फिर डाल रहे पानी  ||
लोगों  का   नेताओं  पर   नहीं भरोसा है  |
सब ने दंगों के लिए इन्हीं  को कोसा है ||
ये क्या पीड़ित लोगों को न्याय दिलाएंगे |
आधी  सहायता तो ये  ही  खा  जायेंगे ||

          श्रीश राकेश जैन |

दंगों के विरोध में

नफरत की विषबेल ये ,यहाँ किसने आकर बोई |
लहू बहा है किसका ,देख बता सकता क्या कोई ?
छोटी-छोटी बातों को ,फिर तूल दे रहे लोग    |
यह सोची-समझी साजिश है,नहीं महज संयोग ||
सिर पर देख चुनाव ,सियासी लोग चल गए चाल |
जाति,धर्म की चिंगारी ,दी जानबूझ कर डाल  ||
कितने मासूमों ने अपने अभिभावक खोये हैं ?
कितने बूढ़े बापों ने  , बेटों के शव ढोए हैं   ??
जोह रहे हैं कितने ही परिजन अपनों की राह ?
लगा दरकने उनके भी अब चेहरे का उत्साह ||
बेकसूर लोगों की ,  जब भी हत्या होती है   |
धरती माता पीट-पीट कर छाती रोती है  | |
हिन्दू हों या मुसलमान ,हैं भारत माँ के लाल |
मचा हुआ है जाति धर्म पर फिर क्यों यहाँ बवाल ||
इन टूटे लोगों को फिर से खड़ा करेगा कौन ?
किंकर्तव्यविमूढ़ राज्य है इस सवाल पर मौन ||
                               श्रीश राकेश जैन |

बुधवार, 8 अगस्त 2012

गुरुवर्य पंडित गोपालदास वरैया

जैन-जाग्रति के पुरस्कर्ताओं की पंक्ति में एक उल्लेखनीय नाम स्यादवादवारिधि,वादीगजकेशर,न्यायवाचस्पति,गुरुवर्य पंडित गोपालदास वरैया का है |पंडित जी का जन्म विक्रम संवत १९२३ में आगरा में श्री लक्ष्मण दास जी जैन के घर हुआ था |आपके पिता की आर्थिक स्थिति बहुत सामान्य थी |जिसके कारण उन्होंने साधारण अंग्रेजी स्कूल में सामान्य शिक्षा प्राप्त की और आजीविका के लिए रेलवे में क्लर्क की नौकरी कर ली |पंडित जी की पत्नी बहुत कर्कश स्वभाव की थी फिर भी उन्होंने कभी भी अपने जीवन की इस कडुवाहट को सार्वजानिक व्यवहार में नहीं आने दिया |पंडित जी के जीवन का पूर्वार्ध भटकाव से भरा और प्रायः निरर्थक रहा |एक दिन किसी विद्वान के शास्त्र प्रवचन सुनकर उनके मन पर इसका बड़ा सकारात्मक प्रभाव पड़ा जिसने उनके जीवन की दिशा ही बदल दी |मानो उनके भीतर छिपी प्रतिभा को प्रस्फुटन के लिए अनुकूल आधार-भूमि मिल गयी |इसके पश्चात् श्रुताभ्यास में निरंतर संलग्न होकर उन्होंने दिगंबर जैन परंपरा के शास्त्रों का गंभीर अध्ययन ,मनन किया और उनमें निपुणता प्राप्त करते हुए संस्कृत और प्राकृत भाषाओँ पर पूर्ण अधिकार प्राप्त कर लिया |आर्ष ग्रंथों की सहायता से उन्होंने जैन सिद्धांत ,तत्वज्ञान ,दर्शन और न्याय को हस्तामलकवत कर लिया |
                    जैन दर्शन के ध्वजवाहक बनकर आपने यत्र-तत्र अनेक जैन पत्र-पत्रिकाओं का संपादन किया |जिनमें दिगंबर जैन महासभा मुंबई का प्रकाशन 'जैन-मित्र' विशेष है |पंडित जी के संपादकत्व में जैनमित्र ने अखिल जैन समाज का पहरुआ बनकर न केवल उसे एक सूत्र में पिरोने का काम किया बल्कि उसकी अस्मिता को एक नई पहचान दी |आपने कई सफल शास्त्रार्थ किये और अपनी वाग्मिता से अजैनों को भी मुग्ध कर दिया |उन्होंने अपनी विलक्षण मेधा से जैन न्याय और सिद्धांत की दुन्दुभी बजाते हुए जैन दर्शन की विमल कीर्ति पताका को फहराया और शैक्षिक क्रांति के अग्रदूत बने |
                       मुरैना का जैन सिद्धांत संस्कृत महाविद्यालय आपकी कीर्ति का मुख्य स्तम्भ है |यह कहना अतिशयोक्ति न होगी कि आज भारतवर्ष में जितने भी जैन विद्वान् हैं उनमें से अधिकांश पंडित जी की शिष्य -प्रशिष्य परंपरा में हैं |
                       समाज सेवा और शिक्षण कार्य में अत्यधिक व्यस्त रहते हुए भी वे अवकाश के क्षणों में चिंतन-मनन करते रहते थे जो 'जैन सिद्धांत दर्पण' सुशीला उपन्यास और जैन सिद्धांत प्रवेशिका के प्रणयन के रूप में हमारे सामने है |इनमें से बहुप्रसारित जैन सिद्धांत प्रवेशिका जैन धर्म और दर्शन के विद्यार्थियों के लिए बहुत उपयोगी है ,जो एक पारिभाषिक कोष का काम देती है|| 

शुक्रवार, 13 जनवरी 2012

चुनावी बीन


बीन बजी ,फिर खुला पिटारा
देखें,किसके हैं पौ -बारह /
किसने खायी दूध-मलाई
दिन दूनी और रात चौगुनी ,
किसने करी कमाई भाई /
किसने पहनी हैं मालाएं नोटों की ,
किसके चर्चे हैं
किसने स्टेचू बनवाकर ,
जनता के पैसे खर्चे हैं /
भरमा रहा कौन जनता को ,
कौन कर रहा झूठे वादे
आस्तीन में सांप छिपाए
किसके हैं खूंख्वार इरादे /
कौन मजहवी जहर घोल कर
चाहे उल्लू सीधा करना ,
महज चुनावी वैतरणी को
चाहे इनसे पार उतरना /
कौन देश का हितचिन्तक है
हर दल ,प्रत्याशी को तौलें ,
कौन तुम्हारा दुःखभंजक है
एक-एक कर सभी टटोलें /
आखिर कुछ मुद्दों का तो हो ,
उचित तरीके से निपटारा
बीन बजी,फिर खुला पिटारा /
देखें किसके हैं पौ-बारह//
       श्रीश राकेश